अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक टकराव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। दोनों देशों के व्यापारिक टकराव को 'ट्रेड वॉरÓ का नाम दिया जा रहा है। शुरू में लगा कुछ मसलों पर मतभेद उभर आए हैं, जो आपसी बातचीत से सुलझा लिए जाएंगे, लेकिन दुर्भाग्य से दोनों पक्ष जिद पर अड़ गए हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त लहजे में कहा था कि अगर चीन ने व्यापार करने के अपने तरीकों में बदलाव नहीं किया तो वह उस पर 100 अरब डॉलर का टैरिफ लगा देंगे। वहीं, इससे पहले चीन ने 50 अरब डॉलर मूल्य के 106 अमेरिकी उत्पादों के आयात पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाने का निर्णय लिया था। उल्लेखनीय है कि मार्च में ट्रंप ने चीन से आयात पर 60 अरब डॉलर यानी 3910 अरब रुपए का टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इससे बौखलाए चीन ने भी उन अमेरिकी उत्पादों की सूची जारी की, जिन पर वह भारी-भरकम आयात शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। बहरहाल ट्रंप की धमकी के बाद चीन ने भी पलटवार करते हुए कहा है कि वह अमेरिका के कदमों के मुहतोड़ जवाब देगा। अमेरिका ने अब तक कई बार चीन पर टैरिफ लगाया है। उसका तर्क है कि चीन गैर-कानूनी तरीके से व्यापार करता है और उसकी इन गतिविधियों ने अमेरिका में हजारों लोगों की नौकरियां छीन ली हैं। ऐसे में अपने व्यापार को बचाने के लिए उसे यह सही कदम लगता है। अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिका ने पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव के दौरान 'अमेरिका पहलेÓ की नीति की घोषणा की थी जिसे वे कार्यान्वित करने में लगे हुए हैं। पहले वीजा पर प्रतिबंध और अब चीन की अमेरिकी बाजार में घुसपैठ कम करने की नीतियां अमेरिकी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देंगे इसमें संदेह नहीं, किंतु इनके दूरगामी प्रभाव न केवल इन दोनों देशों, अपितु पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़ेंगे। अमेरिका-चीन के इस ट्रेड वॉर से विश्व में संरक्षणवाद की प्रवृत्ति बढ़ेगी। इससे बेरोजगारी बढ़ेगी, आर्थिक विकास कम होगी और ट्रेडिंग साझेदार देशों के रिश्ते बिगड़ेंगे। इस टकराव का एक कूटनीतिक पहलू भी है। चीन को इस प्रकरण में रूस का साथ मिल रहा है। दोनों देश आपसी संबंधों और व्यापारिक रिश्तों को सुधारने की कोशिश में हैं और ट्रेड वॉर में भी वे अमेरिका के खिलाफ एकजुट हैं। इस कारोबारी टकराव का भारत पर सीधा असर भले न हो, लेकिन परोक्ष रूप से अर्थव्यवस्था प्रभावित जरूर होगी। एसोचैम का कहना है कि भारत अगर अपना आयात संभाल लेता है तो भी निर्यात पर प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि एक्सचेंज रेट्स भी बढ़ेंगे। विश्व बिरादरी को इस मामले में मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए। उसे चीन और अमेरिका दोनों पर दबाव डालकर इस टकराव को समाप्त करने की पहलकदमी करनी चाहिए। विश्व व्यापार संगठन और अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी संस्थाएं भी इसमें हस्तक्षेप कर सकती हैं। 

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