चुनाव आते ही क्षेत्रीय, जातीय और साम्प्रदायिक उत्तेजनाओं को तूल देने की होड़ से देश में जो विखराव तथा संदिग्धता का माहौल उत्पन्न हो जाता है, उसकी उपेक्षा कर इन उत्तेजनाओं के प्रभाव के आधार पर चुनाव परिणाम का आंकलन किये जाने की होड़ समरसता के जिस वातावरण को देश के लिए आवश्यक है, उसकी उपेक्षा हो जाती है। इन उत्तेजनाओं से निहित स्वार्थ साधने वालों को बेनकाब करने के बजाय समीक्षाओं और परिणामों के आंकलन दोनों में संलग्न लोगों को भी भ्रमित कर देती है। एक देश एक जन जिस अवधारणा पर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था आधारित है, उसे संवाद हीन बनाने की दिशा में निरंतर बढ़ते जाने के कारण उत्तेजनाओं को बल मिल रहा है। यह संवादहीनता देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद में जो वीभत्स स्वरूप धारण कर चुकी है, उसके मर्यादा की सारे हदें पार कर दिया है। संसद संवाद के बजाय उत्तेजना का स्थल बनने का प्रभावशाली फैल चुका है। ऐसे में किसी मुद्दे की समीक्षा औचित्य या अनौचित्य के आधार पर करना बड़ी भारी चुनौती है। लेकिन इस चुनौती से मुंह मोडऩा भी कायरता संगीन विचारधाराओं में अभिव्यक्ति से आई थी। दिखाने में यदि उत्तेजनाओं का प्रभावशाली होगा तो फिर उससे विनाश को ही गति मिलेगी। इस समय देश में जो उत्तेजनाओं के मुद्दे हैं उसमें सबसे चर्चित सर्वोच्च न्यायालय का वह निर्ण है जिसे कथित रूप से अनुसूचित जाति जनजाति उत्पीडऩ निवारण कानून के विपरीत मान लिया गया है। इस निर्णयकी न्यायाधीशों के अनुसार ही-गलत समीक्षा की जा रही है और यदि सही भी है तो उसके लिए न्यायालय की आलोचना या समीक्षा का सहारा लेने के बजाय केंद्रीय सरकार उसकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्यों दलित विरोधी साबित करने की होड़ लग गई है। इस होड़ में मायावती भी शामिल हैं जिन्होंने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की हैसियत से इस कानून के दुरूपयोग को रोकने के लिए जांच प्रक्रिया की ''खामियोंÓÓ को दूर करने का आदेश जारी किया था। इस तथ्य के उजागर होने के बाद उन्होंने आदेश होना स्वीकार करते हुए ''सवर्णोंÓÓ द्वारा इसके दुरूपयोग के कारण बताया है। जांच के बिना आरोपित किया जाना संविधान सम्मत और प्राकृतिक न्याय के विपरीत है, यही मायावती ने किया था। वही सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की समीक्षा में भी है। न मायावती ने कानून समाप्त किया था, न सर्वोच्च न्यायालय ने। लेकिन चुनावी सफलता की आशंका तक तथ्य को स्वीकार करने का साहस जुटाने में बाधक बन जाता है। यहां तक कि जिस पदोन्नति में आरक्षण को समाप्त करने पर सरकार से अमल करने वाले अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार के खिलाफ आंदोलनरत रहने का अपना हथियार भी बेकार साबित होने लगा है। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पदोन्नति में आरक्षण को समाप्त करने के सर्वोच न्यायालय के निर्देश को अप्रभावी बनाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने सभी दलों की सहमति से दस वर्ष के लिए और जारी रखने हेतु संविधान संशोधन किया था, यद्यपि उसका परिणाम उन्हें 2004 के चुनाव में पराजय के रूप में भुगतना पड़ा। दस वर्ष बीतने के बाद एकमेव अखिलेश यादव सरकार ने इसे अमलीजामा पहनाया और जो दलित प्रोन्नति हो चुके थे, उन्हें पदावनत कर दिया। देशभर में और कहीं पदावनति नहीं हुई। भविष्य के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान भले ही समाप्त कर दिया हो लेकिन वर्षों तक एक दूसरे के मतदाताओं को कुचलने को ही प्रशासनिक प्राथमिकता देने वाले दोनों ही दल आज गठजोड़ के लिए उदार अभिव्यक्ति कर रहे हैं यह उदारता अभिव्यक्ति से आगे बढ़ेगी इस पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लग रहा है लेकिन समरसता को तोडऩे में उसका योगदान निरंतर प्रभावशाली होता जा रहा है। क्या मायावती पदावनत के अखिलेश की कार्यवाही की समर्थक हो गई है। या अखिलेश ने पुन: पदावनत करने का वादा किया है जैसा मायावती ने दलितों से वादा किया है। दोनों में कहां सामंजस्य है? देश में चल रहे विघटनकारी आरोपों में सरकार पर आरोप ठीक संसद में विपक्षी आचरण के समान है। संसद को अपनी बात कहने नहीं देने का आरोप लगाकर काम न किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को भाजपा के माथे ठोंकने का काम हो रहा है। सामाजिक समरसता को तोडऩे में कांग्रेस की योगदान उसी दिन से शुरू हो गया था, जब संविधान में, डाक्टर भीमराव रामजी अम्बेडकर के सुझाव को अस्वीकार करते हुए, उसने दस वर्षीय आरक्षण को शामिल किया था, तथा जिस अवधि में उसकी सत्ता पर प्रमुख था, इस अवधि को बढ़ाते हुए स्थायी प्रावधान के रूप में बलकर ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि इस नीति से लाभान्वित होने वाले लाभार्थियों को लाभ मिल रहा है या नहीं इसकी भी समीक्षा करने की अभिव्यक्ति का भी किसी को साहस नहीं हो रहा है। पिछड़ेपन की होड़ में शामिल होने वालों की वर्गीय जातीय और सांप्रदायिक स्वीकारोक्ति प्रदान करने की दिशा में सत्ता में बने रहने के लिए जो प्रयास कांग्रेस ने किया, उसके परिणाम स्वरूप यद्यपि वह 2014 के निर्वाचन के बाद से भारत के नक्शे पर --- जा रही है तथापि 2014 के समरसता अभिव्यक्ति को प्रभावहीन बनाने के लिए वह जो विग्रह बढ़ाने में फिर से जुट ही गई है, क्षेत्रीय हितों के काल्पनिक हित होना बताकर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध में लगा गए हैं। फेडरल गठबंधन का नारा देने वाली ममता बनर्जी जो कुछ बंगाल में कर रही हैं उसके खिलाफ यद्यपि कांग्रेस, वामपंथी दल भी हैं लेकिन यही आवाज उठाने वाली भाजपा के प्रति शत्रुता का भाव बना हुआ है। बंगाल को छोड़कर अन्य राज्यों में जहां ममता का नाम भर है इस फेडरल गठबंधन को चुनावी सफलता के लिए मुफीद समझा जा रहा है। भाजपा की 2014 की जिस सफलता के कारण एकजुटता को देश में नये युग के प्रारम्भ की शुरूआत मानी जा रही थी जिससे दुनिया में भारत का सम्भाव बढ़, और अर्थिक नीतियों के मामले में ऐसे निर्णय जिससे कुछ तकलीफें भी हुए-देश इसलिए सहमत रहा क्योंकि समरसता की भावना के औचित्य की समझ बढ़ी थी। इस समझ को तोडऩे के लिए प्रारम्भ से ही उसे मुस्लिम और फिर अनुसूचित जातियों की विरोधी बताने की वैसी होड़ शुरू हो गई जैसे दलित उत्पीडऩ कानून पर सर्वोच्च न्यायालय की अभिव्यक्ति के लिए भाजपा को दोषी ठहराये जाने की। जबकि चाहे शिक्षा या स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियां हो या रोजगार के लिए बनाई गई योजनायें उनका सर्वाधिक लाभ इसी वर्ग को हो रहा है। चाहे बिजली को घर घर पहुंचाने की प्राथमिकता या बिन मूल्य के गैस कनेक्शन देना से यही वर्ग सर्वाधिक लाभान्वित हुआ है। भारत सरकार या जिन राज्यों के भाजपा की सरकारें हैं उनमें एक भी नीति सम्बन्ध्ीा निश्चय और क्रियान्वयन सम्बन्धी आचरण का उदाहरण नहीं दिया जा सकता  जो इन वर्गों के हितों पर ...... करता हो। सबका साथ और सबका विकास के एजेंडे से सरकार एक इंच भी पीछे नहीं हटी है लेकिन जो सत्ता से सम्पन्नता के आदी रहे हैं, उनको अपने सत्तासीन कार्यकाल में जनहित विरोधी लूट और भ्रष्टाचार में जेल जाने या जेल के भय से हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने वाली सरकार के रूप् में मोदी और भाजपा की राज्य सरकारों को बदनाम करने के लिए मनगढ़ंत आरोपों की बौछार का प्रभाव अब बढऩे लगा है।


संविधान निर्माण के समय डाक्टर अंबेडकर और बाद में प्रथम आयोग का प्रतिवेदन तैयार करने वाले काका कालेलकर ने ''जातीय प्राथमिकताÓÓ के खिलाफ जो चेतावनी दी थी, उसे सभी राजनीतिक दलों ने नजरंदाज किया। विराट बहुमत के बावजूद जवाहर लाल नेहरू की तुष्टीकरण के लिए उतारा के स्वभाव ने जो माहौल बनाया उसके फलस्वरूप आज अराजकता का सहारा लेकर जो वर्गीयता उभर रहा है, उसका आधार निराधार होने के बावजूद कोई भी मुखरित होने के लिए तैयार नहीं है। अब तो तामिलनाडू के कुछ राजनीतिक स्वार्थ साधक पुन: दक्षिण और उत्तर में भेद मूलक उस आंदोलन को उभारने की कोशिश शुरू कर दिया है जिसे अंग्रेजों ने बांटों और राज करो की नीति पर अमल करते हुए आर्य और द्रविड़ संघर्ष के रूप में उभारा था। डा. अम्बेडकर ने इस द्रवि़ आर्य अवधारणा को कृत्रिम और स्वार्थपरक बताया था। जो चेतावनी डा. अंबेडकर और कालेलकर ने दिया था-जाति के आधार पर पिछड़ापन आंकने के भविष्य में दुष्परिणम की-वह इतनी व्यापक हो गई है कि राजनीति सफलता का एकमात्र आचरण मानी जाने लगी है। जो आरक्षण समानता के लिए संबल के रूप में अपनाया गया था, वह घृणात्मक उत्तेजना का आधार बनते जा रहा है। सत्तर वर्षों से, इसके लाभ हानि की समीक्षा की आवश्यकता को नजरंदाज किए जाने से जहां वर्ग में भी अति उपेक्षित वर्ग प्रादुरभाव उभरा है वही आरक्षित वर्गों में योग्यता को पात्रता ना आधार न बनाए जाने के रोष भी। दोनों प्रकार के उभार अराजकता फैला रहे हैं। ऐसे में क्या इस नीति की समीक्षा की आवश्यकता नहीं है। पर करेगा कौन? आरक्षित वर्ग में से ही लाभार्थियों की घरेलू सीमितता होने जाने को ध्यान में रखकर आवाज उठनी चाहिए। एक दलित चिंतक ने ठीक कहा है नौकरियों में आरक्षण के बजाय दलित वर्ग को रोजगार पर ध्यान देना चाहिए। राजनीतिक स्वार्थ के लिए उभरे सभी प्रकार के विघटनकारी अभिव्यक्तियों के मूल में आरक्षण नीति ही है। देशहित में इस नीति की समीक्षा आवश्यक है। आरक्षण को अब जाति नहीं आर्थिक पिछड़ेपन का आधार मिलना चाहिए। इस समय एक नारा चल निकला है, बहुलवाद का। बहुलवाद अर्थातकृविभिन्नताओं को उभारना जो विविधितायुक्त रामराज्य की सनातन भारतीय धारणा के विपरीत है। विविधता और विभिननता का भेद समझना होगा।
                                                                                                                                                          राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

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