भारत के राजनीतिक इतिहास में उपवास का बहुत महत्व रहा है। स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गांधी से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे तक, सबने उपवास के जरिए संदेश देने का काम किया है। महात्मा गांधी ने उपवास को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अपना हथियार बनाया था, तो अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध उपवास से आंदोलन खड़ा किया और भ्रष्टाचारियों को झुकाया है। राजनीति में उपवास के जरिए अपने विरोधी को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास तो किया ही जाता है, इसके साथ ही जनता में भी एक संदेश जाता है। उपवास की यह राजनीति फिर से देखने में आ रही है। पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राजघाट पर उपवास कर भाजपानीत केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दलित विरोधी सिद्ध करने का प्रयास किया। हालाँकि अपने इस प्रयास में उन्होंने गलतबयानी का साथ भी लिया। वहीं, राहुल गांधी के इस उपवास को उनके ही नेताओं ने 'उपहासÓ में बदल डाला। राहुल गांधी के उपवास का स्वाद छोले-भटूरे ने खराब कर दिया। यह उपवास उन्हें उलटा पड़ गया। उपवास के जरिए मोदी के विरुद्ध वातावरण बनाने की योजना थी, लेकिन कांग्रेस को स्वयं का ही बचाव करना पड़ गया। बहरहाल, अब भाजपा भी 'उपवासÓ से कांग्रेस पर 'वारÓ करेगी। 12 अप्रैल को भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विपक्ष को अलोकतांत्रिक बताने के लिए उपवास पर बैठने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि भाजपा ने कांग्रेस पर संसद के बजट सत्र को बाधित करने का आरोप लगाते हुए पहले ही उपवास की घोषणा की थी। यह महत्वपूर्ण इसलिए हो गया है कि अब भाजपा को अपने शीर्ष नेताओं का भी साथ मिल गया है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी पूरे दिन के उपवास पर बैठेंगे। प्रधानमंत्री मोदी अपने कार्यालय में उपवास रखेंगे और नियमित कार्य करेंगे। वहीं, अमित शाह कर्नाटक के हुबली में उपवास और धरने पर बैठेंगे। जबकि भाजपा के राज्यसभा सांसद देश के कोने-कोने में जाकर विपक्ष के गैर-जिम्मेदार व्यवहार को जनता के सामने रखेंगे। यह सही बात है कि संसद सत्र में जिस प्रकार का व्यवहार विपक्ष ने किया है, वह बहुत ही गैर-जिम्मेदार है। बजट सत्र को इस प्रकार पहले कभी ठप नहीं किया गया है। यकीनन यह अलोकतांत्रिक व्यवहार है। राजनीति और विरोध अपनी जगह है, किंतु देशहित में संसद को इस प्रकार बाधित करना उचित नहीं कहा जा सकता। विपक्ष को एक बार अपने आचरण के संबंध में विचार करना चाहिए। विशेषकर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी को सोचना चाहिए कि वह किस प्रकार की परंपरा स्थापित कर रही है। कांग्रेस यह सब हथकंडे अपनी खोया हुआ जनाधार और भरोसा प्राप्त करने के लिए अपना रही है। किंतु, कांग्रेस के नेता भूल रहे हैं कि उसके इस प्रकार के आचरण को जनता ने पिछले चार साल में नकारा ही है। एक लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय पार्टी की पहचान होती है कि वह अपना मूल्यांकन करती रहे और जनता का मन भी पढऩे का प्रयास करे। पिछले कुछ वर्षों में जब-जब कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी से जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा की गई है, तब-तब वह जनता की इस अपेक्षा पर बुरी तरह असफल रहे हैं। महत्वपूर्ण अवसर पर या तो वह गायब हो जाते हैं, या फिर उस मुद्दे पर जनता के मन के विरुद्ध पक्ष लेते हैं। बहरहाल, अपने सांसदों से 'कामकाज नहीं तो वेतन नहींÓ की घोषणा करवा कर भाजपा पहले ही विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक जीत दर्ज कर चुकी है। अब 12 अप्रैल को भाजपा का उपवास कांग्रेस के पेट का हाजमा बिगाड़ सकता है। 

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