गणेश मिश्रा, बीजापुर। एक बार फिर साबित हो गया कि मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जो खुली आंखों से सपने देखते हैं। अरुण पूनेम और सुनीता हेमला, बस्तर की ये दो बेटियां इसका जीवंत उदाहरण हैं। नक्सल हिंसा से प्रभावित बीजापुर के 'अति संवेदनशील" और सुविधाविहीन गंगालुर की यह दो बेटियां कभी जंगलों में तेंदू पत्ता और महुआ बीना करती थीं।

अब देश का प्रतिनिधित्व करने जा रही हैं। मई में फिलीपींस में होने वाली एशियन सॉफ्टबॉल चैंपियनशिप में दोनों भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। 14 अप्रैल को बीजापुर आगमन पर पीएम दोनों बेटियों से मिलकर हौसला अफजाई करेंगे।

गंगालुर को नक्सल आतंक के लिए जाना जाता है, लेकिन अब इसे अरुण और सुनीता के कारण भी जाना जाता है। आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद पिछड़े छत्तीसगढ़ के इस इलाके में वनवासियों के लिए वनोपज ही जीवन यापन का सहारा है।

तेंदू पत्ता और महुआ का संग्रहण कर जीवन यापन करने वाली कक्षा नौ की छात्रा अरुण पूनेम और सुनीता हेमला बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं।

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