भारत और नेपाल एक ही संस्कृति से संबंध रखते हैं। इसलिए दोनों देशों के नागरिकों के भी एक-दूसरे से आत्मीय संबंध हैं। दोनों देश हिमालय संस्कृति के पुत्र हैं। दोनों देशों के बीच वर्षों से भ्रातृत्व भाव है- बड़े भाई-छोटे भाई का संबंध। यह संबंध दोनों देश की जनता स्वीकार करती है। किंतु, भारत विरोधी शक्तियों ने पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच दरार डालने का काम किया है। दोनों देश समझते हैं कि यह दरार उनके लिए कितनी अधिक नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। संबंधों में फिर से वही मधुरता आए इसके लिए दोनों देश के जिम्मेदार राजनेताओं को विचार करना चाहिए। नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की भारत यात्रा को इसी सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। इस यात्रा के दौरान जो सहमतियां-योजनाएं बनी हैं, निश्चित ही उनसे भारत और नेपाल के बीच संबंधों में गर्माहट आएगी। भारत और नेपाल के प्रधानमंत्रियों के बीच हुए तीन करार को दोनों देशों के बीच संबंधों लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण है, रक्सौल और काठमांडू के बीच बिजली की रेल लाइन बिछाना। एक वर्ष के भीतर इसके सर्वेक्षण का काम पूरा कर लिया जाएगा और उसके बाद इस पर काम शुरू कर दिया जाएगा। इस रेल लाइन के बन जाने के बाद काठमांडू सीधे नई दिल्ली से जुड़े रेलवे नेटवर्क से जुड़ जाएगा। यह रेल नेटवर्क दोनों देशों के बीच धमनी की तरह काम करेगा। इसी तरह जल परिवहन के लिए बनी सहमति भी महत्वपूर्ण है। इससे जमीन से घिरे नेपाल को नदियों के माध्यम से समुद्र तक पहुंचने का रास्ता मिल सकता है। जाहिर है कि नेपाल इसे ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है। इसके साथ ही भारत ने नेपाल में कृषि के विकास के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है। भारत कृषि के विकास में अपने अनुभवों और नई तकनीक को साझा करेगा। प्रधानमंत्री ओली ने रविवार को जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय जाकर वहां अत्याधुनिक शोधों का जायजा लेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारत में मिट्टी की जांच के अनुभवों को साझा करने का भरोसा दिया है। इस प्रवास की एक और महत्वपूर्ण बात को रेखांकित किया जाना चाहिए। दोनों देशों के प्रधानमंत्री भारत-नेपाल की मित्रता की आवश्यकता को समझते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी बातचीत में विवादित मुद्दों को बाहर रखा है। नेपाल और भारत, किसी ने भी द्विपक्षीय संबंधों के विवादित मुद्दे को नहीं उठाया। यहां तक कि भारत ने चीन का नाम तक नहीं लिया। जबकि सब जानते हैं कि भारत और नेपाल के बीच दरार डालने का काम चीन ने ही किया है। चीन किसी भी प्रकार नेपाल पर अपना प्रभाव जमाना चाहता है। बाद में, नेपाल का उपयोग वह भारत के विरुद्ध कर सकता है। इस दृष्टि से भारत को चीन-नेपाल के संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री कोली से चर्चा करनी चाहिए थी। किंतु, दोनों देशों के बीच संबंध सुधार की प्रक्रिया को ध्यान में रख कर चीन का जिक्र न करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उचित ही किया। दोनों प्रधानमंत्रियों ने आपसी सहयोग से दोनों देशों में विकास को बढ़ावा देने पर जोर दिया। इन प्रयासों को देखकर उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में दोनों देश पुन: अपने पारंपरिक संबंधों को प्राप्त करेंगे। 

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