रामकथा में अशोक-वाटिका के फल खाने के बाद रावण की प्रभुताई को हनुमान जैसे एक चुनौती दे देते हैं और फिर जो घटता है, वह जैसे समस्त वानर-दल के जन्म को सार्थक बना जाता है।
इसलिए जाम्बवान ने राम से कहा कि पवनसुत ने जो किया है, वह हजारों मुखों से भी वर्णित नहीं हो सकता। फिर वे पवनपुत्र के कार्य राम को सुनाते हैं। उनकी ''करनीÓÓ को, उनके कर्म को, उनके पुरुषार्थ को बताते हैं। मैंने ऊपर इसीलिए वर्जित फल को तोडऩे को ''कर्म की प्राप्तिÓÓ के रूप में बताया था। यह देखना बहुत सुंदर है कि ''करनीÓÓ ही ''चरितÓÓ के रूप में जाम्बवान द्वारा राम को बताई जा रही है। कर्म से ही हनुमान ने स्वयं को परिभाषित किया। कर्म ही उनका चरित्र है। 'करहिंÓ भालु कपि अद्भुत करनी।Ó और जिस तरह से हनुमान ने विभीषण को रामकथा सुनाई थी, अब हनुमान-कथा राम को सुनाई जा रही है।
और यह कोई साधारण अवसर नहीं है कथा-श्रवण का। प्रसिद्ध भारतीय त्रिमूर्ति के ये तीनों अवतार हैं। ब्रह्मा के अवतार हैं जाम्बवान। रुद्र के अवतार हैं हनुमान और विष्णु के अवतार हैं राम। वक्ता ब्रह्मा, श्रोता विष्णु, विषय शिव, साक्षी शिव। जैसे रामकथा रामचरितमानस बनी वैसे ही हनुमत् कथा हनुमतचरित के रूप में सामने आई। यह सुन्दरकाण्ड का एक बहुत पोयटिक क्षण है। रामकथा का परिणाम था ''पावा अनिर्वाच्य विश्रामाÓÓ लेकिन हनुमत कथा के बाद तो ''अब विलंब केहि कारन कीजैÓÓ वाली कर्म-सन्नद्धता आएगी। इसलिए जाम्बवान जी ने ''करनीÓÓ की बात की थी। ''पवनतनय बल पवन समानाÓÓ की याद जाम्बवान जी ने हनुमान को दिलाई थी। अब वही बल जब कर्म में परिणत हो गया तब जाम्बवान ''करनीÓÓ बताने लगे। इसलिए इस एक शब्द से तुलसी पवनतनय के बल का चरितार्थ होना बताते हैं। स्वयं हनुमान अपनी करनी का दावा नहीं करेंगे। वे तो उन लोगों में से हैं जो कर्म को ही बोलने देते हैं। स्वयं बोलना तो पाप समझते हैं। 'जौं करनी समुझै प्रभु मोरी/नांहि निस्तार कलप सत कोरी।Ó उत्तर कांड में एक भिन्न प्रसंग में भरत जी द्वारा सोची गई इस बात को इस वक्त के हनुमान की मन: स्थिति में रख के देखिए। एक दम फिट बैठेगी। तुलसीदास की ही एक अन्य उक्ति इसका कारण भी बताएगी : 'सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु/विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथाहिं प्रतापु।Ó लेकिन वह करनी जिसके बारे में स्वयं ब्रह्मा कहें कि वह उनके हजारों मुखों से भी वर्णित नहीं हो सकती, वह अलौकिक ही है : 'असि सब भाँति अलौकिक करनी/महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।Ó ब्राहृा चार मुख वाले हैं, उनको लग रहा है, इस वक्त उनके हजार मुख होने चाहिए थे। वक्ता के रूप में ब्राहृा का कौशल पुराण-प्रसिद्ध रहा है। ब्राहृा को वागीश कहा गया है। उनके चार मुख चार वेदों के प्रतीक हैं। यदि वे भी कम पड़ रहे हों तो सोचा जा सकता है कि हनुमान की 'करनीÓ का स्तर क्या रहा होगा? ब्राहृा को अक्षर, आदिकवि, कवि, गिरापति, वागीश्वर, वाचस्पति, वेदगर्भ, वेदेश्वर, श्रुतिभाल कहा गया है। वही ब्राहृा अपनी असमर्थता प्रकट कर रहे हैं जाम्बवान के रूप में कि उनसे पवन तनय की करनी वर्णित नहीं होती।
वे स्वयं अपनी बात ही नहीं करते। वे कहते हैं कि, पर्यायत: शेषजी के मुख से भी वर्णित नहीं हो सकती। शेषनाग को सहस्त्रानन भी कहा गया है। लेकिन वे भी इसमें समर्थ नहीं हो सकते। भक्त भगवान के बारे में जो कहता है, वह कभी उस पर भी प्रभु-कृपा से चरितार्थ होने लगता है। हनुमान ने रावण को कहा था : 'जा बल सीस धरत सहसानन।Ó अब वही सहस्त्रानन जिन्हें राम से बल मिलता है, भी हनुमान की करनी को पूरी पूरी तरह बताने में असमर्थ बताए गए हैं। राम के बारे में इसी कांड में आगे चलकर यह स्वयं रावण का दूत कहता है कि 'राम तेज बल बुधि बिपुलाई/सेष सहस सत सकहिं न गाई।Ó (5/56) ध्यान दें कि जाम्बवान तो तब कह रहे हैं जब स्वयं शेषावतार लक्ष्मण सामने बैठे हैं। शुक तो अपनी बात रावण के सामने कहता है। यह अवश्य है कि जाम्बवान एक शेष की बात करते हैं जबकि शुक ''सहस सतÓÓ की। शेष ु1000ु100 भी मिलकर राम की महिमा तेज, बल, बुद्धि का गायन नहीं कर सकते। कई पंडित इसी के आधार पर भक्त को भगवान से कमतर बता देते हैं। एक लिखते हैं : ''यहां प्रभु का पराक्रम दास के पराक्रम से अधिक जनाने के लिये 'सहसमुखÓ कहा क्योंकि पहले कहा है कि प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ, अएतन प्रभु का पराक्रम अधिक हुआ ही चाहे। प्रभु के चरित के सम्बन्ध में 'शत सहस शेषÓ कहा है, - 'राम तेज बल बुधि बिपुलाई! सेष सहस सत सकहि न गाई '(5/56)।ÓÓ लेकिन ऐसी व्याख्याएं भक्त और भगवान के बीच में व्यर्थ का सांख्यिकीय द्वैत पैदा करती हैं। यदि भक्त में ''प्रभु कृपाÓÓ चमक रही हो तो उसकी 'करनीÓ में कोई कमी कैसे रह जाएगी? वैसे भी हनुमान इसी प्रभुकृपा से उस स्टेटस को प्राप्त हुए जहां अब देश के कोने-कोने में उनके मंदिर हैं। भक्त भगवान की तरह मान्य। इसीलिए रुद्रावतार और विष्णुअवतार में कोई गणितीय वनअपमैनशिप नहीं होती, नहीं हो सकती।
यह भगवानों की विशेषता है कि उनके बीच कोई स्पर्धा नहीं है। हालांकि जैसे अभी पैदा करने की कोशिश हमने देखी, वैसी पूर्वकाल में भी रही होगी और उसकी कई कथाएं चलती भी हैं। लेकिन तुलसी की विशेषता ही यह रही कि वे इन व्यर्थताओं को भली प्रकार पहचानते थे। तुलसी की उसी स्पिरिट को देखते हुए यहां कोई गुणा-भाग मुझे उचित नहीं लगता। उस प्रसंग में तो और भी नहीं जो त्रिमूर्ति अवतारों के एकत्र होने का विलक्षण क्षण है।
हनुमान ने जब अपने साथी वानरों को लंका-प्रसंग सुनाया था, तो वह इतिहास था। तुलसी ने कहा भी- 'पूछत कहत नवल इतिहासा।Ó लेकिन जाम्बवान के मुख से वही इतिहास 'चरितÓ बन गया है। इसी से पता लगता है कि क्यों ब्राहृा को कवि या आदिकवि के पर्याय दिए गए। जाम्बवान ने हनुमान की कथा में कुछ रसमयता जरूर घोली होगी। 'चरितÓ शब्द हिंदी काव्य साहित्य में एक विशेष अर्थ में लिया जाता रहा है। सूरदास ने द्वारिका चरित आदि बहुत से चरित लिखे हैं, नरोत्तमदास ने सुदामा चरित व ध्रुव चरित लिखे। हेमचन्द्र ने 11वीं-12वीं शती में कुमारपाल चरित की रचना की थी। इसके पूर्व कश्मीरी कवि विल्हण ने विक्रमांक देव चरित की रचना की थी। चरित सुनने का भी होता है और करने का भी - 'किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूपÓ (तुलसीदास) या 'सोइ सच्चिदानंदघन कर नर चरित उदारÓ। जाम्बवान 'करनीÓ की बात भी कहते हैं और 'करनीÓ के वर्णन में वैसी ही असमर्थता व्यक्त करते हैं जैसी 'चरितÓ के वर्णन में रघुपति के बारे में की जाती है - 'रघुपति चरित न बरनि सिराही।Ó और सुनाने के अर्थ में तो 'जामवंत रघुपतिहि सुनाएÓ है ही - 'कहा कहौं ब्राजनाथ चरित, अन्तरगति लूटत।Ó (सूरदास)। 'यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परइ भवकूपा।Ó फ्रेंच भाषा में 'चरितÓ से मिलता जुलता शब्द 'चरित्रेÓ है जिसका अर्थ परोपकार है। चरित से मिलता जुलता शब्द अंग्रेजी में कैरेक्टर है। ग्रीक में खैरेक्तर। हनुमान ने लंका दहन कर जगत् का उपकार ही किया था। जो बात रामकथा के इन पात्रों को हम लोगों की आजकल की आदतों से पृथक करती है, वह यह कि हम लोग जब अपने बारे में बोलते हैं, तो वह इतिहास न होकर 'चरितÓ होता है। हनुमान की सी वस्तुनिष्ठता हम लोगों को संभव ही नहीं होती। डेविड डेलिंजर ने इसीलिए लिखा भी कि शठ्ठद्ग 2ड्ड4 शह्म् ड्डठ्ठशह्लद्धद्गह्म्, ड्डद्यद्य ड्डह्वह्लशड्ढद्बशद्दह्म्ड्डश्चद्धद्बद्गह्य ड्डह्म्द्ग द्यद्बद्गह्य. 'चरितÓ झूठ नहीं होता, लेकिन वह इतिहास भी नहीं होता। जाम्बवान इतिहास सुनकर चरित कहते हैं। अपने प्रभु के सामने वे झूठ नहीं कह सकते। उन्होंने कहने की सोची भी नहीं होगी। लेकिन उन्होंने जो कहा वह नीरस तरीके से नहीं कहा, रसमय तरीके से कहा। हनुमान के चरित अपने आप में सुहाने लगने वाले हैं। मनोरम और चित्ताकर्षक। उस पर ब्रह्मवतार जामवंत की वाणी। उससे यह एक सर्किल पूरा हो गया। सुंदरकांड के आरंभ में हनुमान को जामवन्त के वचन अति भाए थे, अब कृपानिधि राम को अतिभाए हैं। पहले 'जामवंतÓ के बचन सुहाए/सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।Ó और अब ''सुनत कृपा निधि मन अति भाए।ÓÓ हनुमान के प्रयाण की वीरगाथा पूरी हो गई है। प्रयाण की प्रेरणा जिसके शब्द थे, प्रयाण का परिपाक भी उसी के शब्दों में निरूपित हो रहा है। जामवन्त के शब्द मन को भाने वाले शब्द हैं। हनुमान और राम दोनों को। ब्रह्मा के शब्द शिव और विष्णु दोनों को अच्छे लगेंगे ही। शुरू में रुद्र को सुनाया, बाद में कमलापति को। ऋक्षपति के शब्द ऋक्षनेमि को प्रियंकर लगेंगे ही। ऋक्षराज के शब्द ऋषभध्वज को अच्छे लगे थे। कुछ कारीगरी सुनाने वालों की है और बाकी सब उसकी है जिसका चरित सुनाया जा रहा है।
यह होता ही कि वे चरित कृपानिधान श्रीराम को अत्यन्त प्रिय लगे। लैटिन भाषा में चरित के लिए जो ड़ठ्ठद्धत्द्यठ्ठद्म शब्द हैं, उसका एक अर्थ प्रिय भी है। राम को कृपानिधि कहा गया क्योंकि ''प्रभु की कृपा भयउ सब काजुÓÓ हुआ था। अब कृपा की वही कथा उन तक लौटी। जैसे कृपा का भी एक वर्तुल है। सिर्फ सुदर्शन ही चक्र नहीं है। कृपा का भी चक्र है। जिस तरह से राम की कृपा हनुमान में प्रतिबिम्बित हुई, उसी तरह से हनुमान राम में प्रतिबिम्बित हुए। राम को अपने अंतरंग से जान पड़े। अपने सुह्मद। इसलिए फिर राम ने हनुमान को अपने गले से लगा भी लिया। जिस तरह से प्रस्थान करते वक्त पहले सबके सब गए, फिर हनुमान से एक पृथक भेंट, राम की जाने के पूर्व हुई। उसी क्रम में अब यह हुआ कि पहले तो ''सब भेटे रघुपति करुनापुंजÓÓ के अनुसार सभी से सम्मिलित भेंट हो गई थी, लेकिन हनुमान से अब लौटने पर भी एक पृथक भेंट हुई जिसमें प्रसन्नता पूर्वक राम ने उन्हें गले लगा लिया। 'फिरÓ शब्द दुबारा गले मिलने पर ही इंगित नहीं करता; वह प्रस्थान-पूर्व और आगमनोपरांत सादृश्य की ओर भी संकेत करता है। सिर्फ इसी में ही 'फिरÓ का उपयोग नहीं होता बल्कि 'जामवंतÓ के वचन सुहाएÓ पहले था, फिर अब 'पवनतनय के चरित सुहाएÓ हुआ है। दोनों ही बार सुहाई है जाम्बवान की वक्तृता। 'फिरÓ का उपयोग और भी है। पहले 'सुनि हनुमत हृदय अति भायेÓ थे तो अब 'सुनत कृपानिधि मन अति भाएÓ है। साधारण पसंद नहीं आने की बात नहीं है। अत्यन्त पसंद आने की बात है। पहले भी, अभी भी। पहले ''हरषि हियÓÓ चले थे हनुमान। फिर अब ''हरषि हिय लाएÓÓ है। 'स्वयंÓ हनुमान को भगवान राम। यानी ''चले हरषि हिय धरि रघुनाथाÓÓ का ही फल मिला है जब ''पुनि हनुमान हरषि हिय लाएÓÓ की स्थिति आती है। यानी ''पुनिÓÓ शब्द वहां बहुत केन्द्रीय है और चारों दिशाओं में अपना अर्थालोक वितरित करता है। यह जैसे एक तरह की पूर्णता है। फलागम और फलसिद्धि। शुभकार्य की शुरुआत में ही उसकी परिणति के बीज होते हैं। यानी यहां पुनि शब्द लौटकर सुग्रीव से मिलने और फिर राम से मिलने की समानता के कारण ही अपनाया नहीं गया है। उसके और भी आयामी आवर्तन हैं। सुग्रीव से मिलने और राम से मिलने में समानताएं तो हैं ही। 'सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभुकाजÓ की तुलना राम कपिन्ह जब  आवत देखा/किए काजु मन हरष बिसेषाÓ से की जा सकती है। 'आइ सबन्हि नावा पद सीसाÓ की तुलना 'परे सकल कपि चरनन्हि जाई सेÓ। ''मिलेउ सबन्हि अति प्रीतिÓ की 'प्रीतिसहित सब भेंट रघुपति करुना पुंजÓ से। 'पूछी कुसल कुसल पद देखीÓ की 'पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पदकंज सेÓ। 'रामकृपा भा काज बिसेषीÓ की 'प्रभु की कृपा भयउ सब काजूÓ से। 'नाथ काजु कीन्हेउ हनुमानाÓ की 'नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनीÓ से। 'सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊÓ की तुलना 'पुनि हनुमान हरषि हिय लाएÓ से। ये आसान सादृश्य हैं, जिनकी याद ''पुनिÓÓ के इस अक्ष पर सहज ही आ जाती है। ये तो अभी अभी घटित हुए हैं। लेकिन 'पुनिÓ का जो चक्र प्रवर्तन प्रस्थान-पूर्व विदाई के क्षणों में हुआ था, वह लौटकर वापस आने पर एक नयी अर्थ-संभरता और हार्दिक संतृप्ति के साथ घटता है। पहले जो 'आयसु मागी चरन सिरु नाईÓ और 'पीछे पवन तनय सिरु नाईÓ था, वही अब 'परे सकल कपि चरनन्हि जाईÓ में प्रोन्नत हुआ। पहले सुग्रीव के बाद राम के सामने शीश झुकाया, इस बार सुग्रीव के साथ राम के चरणों में गिर  पड़े। पहले सिर झुकाने में विनम्रता थी, इस बार चरणों में गिर पडऩे में प्रेम और कृतार्थता का भाव है। पहले यह बात उनके 'सिरÓ की थी, अब यह बात इन 'चरणोंÓ की है। पहले 'परसा सीस सरोरुह पानीÓ था। अब 'पुनि हनुमान हरषि हिय लाएÓ हैं। अब जितने हनुमान गद्गद् हैं, उतने ही राम भी। पहले अंगद, नल, हनुमान और जाम्बवान ही राम के चरण-स्पर्श कर सके थे, अब सब ने किया। हनुमान ने पूरे वानर दल को कृतकृत्य कर दिया। अब उनमें ज्यादा एकता है। हनुमान को ही इष्ट लाभ नहीं हुआ, बल्कि सभी वानर सफलमनोरथ हो गये। इसलिए इस प्रणति की 'पुनिÓ का महत्व दूसरा है। यह सिद्धकार्यता की ही निशानी नहीं है, यह सिर्फ चार लोगों की नहीं सारे वानर दल की ऋद्धि है। उस क्षण वानर 'जुटेÓ और 'डटेÓ बढ़कर यहां आ गए हैं जब फलोदय हो रहा है। उस कार्यानुष्ठान का एक ही फलागम था। राम की चरण-शरण। वो अब मिल गई। अब जाकर सुग्रीव के उस विदाई-वक्त कथन का अर्थ साक्षात् हुआ-'देह धरे कर यह फलु भाई/भजिअ राम सब काम बिहाई।Ó
ऐसी भाव-गद्गद स्थिति में राम अक्सर गले लगा लेते हैं। 'मुनि बचन राम मन भाए/बहुरि हरषि मुनिवर उर लाए।Ó या 'करत दंडवत मुनि उर लाए।Ó या 'श्री रघुवीर हरषि उर लाएÓ या पर भूमि नहिं उठत उठाए बर करि कृपा सिन्धु उर लाएÓ या 'बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधानÓ। इसे देखकर 5द्बह्लड्ड द्ध. ङ्कड्डह्म्ड्ड1ड्डठ्ठ के द्वारा किया ॥त्र का विश्लेषण मुझे याद आता है '॥द्गद्यश्चद्बठ्ठद्द ठ्ठद्यशष्द्म त्रह्म्द्गड्डह्लठ्ठद्गह्यह्य' का संक्षिप्तीकरण है द्धह्वद्द. राम जब गले से लगाते हैं तो वे विद्युत और ऊर्जा की एक तरंग-सी दौड़ा देते हैं, उस व्यक्ति के शरीर में ही नहीं, उसके पूरे व्यक्तित्व और जीवन में। जैसे इतनी मेहनत के बाद हनुमान एकदम रिलेक्स हो गए हों, जैसे वे रिफ्रेश हो गए हों, जैसे वे रिन्यू हो गए हों। धन्य हो गए हों। जॉन गेडेस (छ्वशद्धठ्ठ त्रद्गस्रस्रद्गह्य) अपनी पुस्तक 'अ फेमिलियर रेनÓ में कहते हैं।   .....ङ्खद्धद्गठ्ठ ह्यशद्वद्गशठ्ठद्ग द्बह्य द्धशठ्ठद्गह्यह्ल ड्डठ्ठस्र 1ह्वद्यठ्ठद्गह्म्ड्डड्ढद्यद्ग, ह्लद्धद्ग4 2ह्म्द्बठ्ठद्द द्व4 द्धद्गड्डह्म्ह्ल - ढ्ढ 2ड्डठ्ठह्ल ह्लश द्धह्वद्द ह्लद्धद्गद्व द्घशह्म् ड्ढद्गद्बठ्ठद्द ह्म्द्गड्डद्य.....    हनुमान की ईमानदारी और विनम्रता राम का ह्मदय जैसे मथ के रख देती है। सिवाय गले लगाने के तब कुछ और बनता ही नहीं। यह वह कोई मैनर्स वाला गले लगाना नहीं था। वह यदि होना ही है तो पहले वाला हो सकता था, इस 'पुनिÓ वाले गले लगाने में अंतरंगता है, हनुमान राम के ह्मदय का हिस्सा हो गए हैं। इसलिए 'पुनिÓ शब्द सिर्फ उस शारीरिक क्रिया के बाबत है। अन्यथा दूसरी बार हनुमान को गले लगाना एकदम नया है। ये भावनाएं एकदम घनिष्ठ हो जाने की हैं। इसने हनुमान और राम को एकसूत्र में बांध दिया है। अब हनुमान के जीवन में ऐसी कोई रिक्तता नहीं है जो इस तरह गले लगने के बाद दूर न हो गई हो। राम को ह्मदय में रख कर चले थे, राम ने ह्मदय से लगा लिया।
राम हनुमान से पूछते हैं कि हे तात! कहो जानकी किस प्रकार रहती हैं और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं। पंडित इस सहज प्रश्न की व्याख्या यह करते हैं कि ''श्री अवध में तो वे कहती थीं कि- 'राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनि अहिं प्रानÓ (2/66) तो अब मेरे वियोग में प्राणों की रक्षा क्यों कर रही हैं? (मा.पी.) श्री राजबहादुर लमगोड़ाजी के शब्द हैं : ''यदि श्रीरामजी के ह्मदय में गुप्त शंका हो (है नहीं) कि सीताजी तो कहती थीं कि वियोग में मैं जीती नहीं रह सकती- (की तन प्रान कि केवल प्राना) तो अब जीती कैसे हैं? क्या वह दावा झूठ था।ÓÓ
अब लमगोड़ाजी ने तो फिर भी इस 'गुप्त शंकाÓ को 'यदिÓ से ढांप लिया और कोष्ठक में 'है नहींÓ भी लिख दिया, लेकिन राम के संबंध में ऐसी कल्पना भी निर्दयता है। क्या राम इतने ह्मदयहीन थे कि वे इस समय अपनी पत्नी की मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे? कि ऐसे वक्त उन्हें अवध में कहे हुए सीता के शब्दों के कारण कौतूहल जागेगा? उन्हें चिन्ता नहीं होगी, जिज्ञासा होगी? कि सीता मरके ही शायद राम के प्रति अपने प्रेम के गांभीर्य और निष्ठा का प्रमाण दे सकती थीं? उनका जीते रहना जैसे उसमें किसी कमी का परिचायक है? जैसे कि यह कोई रीतिकालीन प्रेम हो। या लैला-मजनू का। घनानंद इसका ज्यादा सही उत्तर देते : 'हीन भएं जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानै/नीरसनेही कों लाय कलंक निरास है कायर त्यागत प्रानै/प्रीति की रीति सु क्यों समुझै जड़, मीन के पानि परै को प्रमानै/या मन की जु दसा, घनआनंद जीव की जीवनि जान ही जानैं।Ó यानी मीन जल के अधीन रहती है। अत: जल के घट जाने पर या जल से अलग हो जाने पर उसका तड़पना घनानंद जैसे विरही की आकुलता की बराबरी नहीं कर सकता। जल के वियोग में तड़प-तड़प कर मर जाने वाली मीन अपने प्रिय पर निठुर होने का कलंक लगाती है। मीन जल से बिछुड़कर इसलिए प्राण त्याग देती है कि वह कायर है। प्यार में दुख की मार को सहन नहीं कर पाती। प्रीति की रीति 'जीवनÓ में है, वियोग व्यथा से घबराकर प्राण दे देने में नहीं। घनानंद 'जानÓ शब्द का प्रयोग करते हैं- वह प्रिय सब कुछ जानने वाला है, इसलिए मेरी व्यथा भी जान लेगा। घनानन्द अल्बर्ट कामू के यह लिखने से बहुत पहले लिख गए थे- क्चह्वह्ल द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग द्गठ्ठस्र शठ्ठद्ग ठ्ठद्गद्गस्रह्य द्वशह्म्द्ग ष्शह्वह्म्ड्डद्दद्ग ह्लश द्यद्ब1द्ग ह्लद्धड्डठ्ठ ह्लश द्मद्बद्यद्य द्धद्बद्वह्यद्गद्यद्घ. 
इसलिए प्रिय के वियोग में जिन्दा रहना किसी न्यूनता का सूचक नहीं है। घनानंद की दृष्टि काफी आधुनिक है। तुलसी भक्ति का तर्क चुनते हैं और भक्ति को जीवन से पलायन की किसी विधि के रूप में बताने वालों के सामने कहते हैं कि वह जीवन को थामे रखने का उपाय है। एमिल दुर्खाइम आत्महत्या के ऊपर लिखी अपनी प्रसिद्ध कृति में कहते हैं:  ढ्ढद्घ ह्म्द्गद्यद्बद्दद्बशठ्ठ श्चह्म्शह्लद्गष्ह्लह्य द्वड्डठ्ठ ड्डद्दड्डद्बठ्ठह्यह्ल ह्लद्धद्ग स्रद्गह्यद्बह्म्द्ग ह्लश द्मद्बद्यद्य द्धद्बद्वह्यद्गद्यद्घ, द्बह्ल द्बह्य ठ्ठशह्ल ड्ढद्गष्ड्डह्वह्यद्ग द्बह्ल श्चह्म्द्गड्डष्द्धद्गह्य ह्म्द्गह्यश्चद्गष्ह्लह्य द्घशह्म् द्धद्बह्य श्चद्गह्म्ह्यशठ्ठ ड्ढड्डह्यद्गस्र शठ्ठ ड्डह्म्द्दह्वद्वद्गठ्ठह्लह्य ह्यह्वद्ब द्दद्गठ्ठद्गह्म्द्बह्य, ड्ढह्वह्ल ड्ढद्गष्ड्डह्वह्यद्ग द्बह्ल द्बह्य ड्ड ह्यशष्द्बद्गह्ल4. ङ्खद्धड्डह्ल ष्शठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वह्लद्गह्य ह्लद्धद्बह्य ह्यशष्द्बद्गह्ल4 द्बह्य ह्लद्धद्ग द्ग3द्बह्यह्लद्गठ्ठष्द्ग शद्घ ड्ड ष्द्गह्म्ह्लड्डद्बठ्ठ ठ्ठह्वद्वड्ढद्गह्म् शद्घ ड्ढद्गद्यद्बद्गद्घह्य ड्डठ्ठस्र श्चह्म्ड्डष्ह्लद्बष्द्गह्य ष्शद्वद्वशठ्ठ ह्लश ड्डद्यद्य ह्लद्धद्ग द्घड्डद्बह्लद्धद्घह्वद्य 2द्धद्बष्द्ध ड्डह्म्द्ग ह्लह्म्ड्डस्रद्बह्लद्बशठ्ठड्डद्य ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्म्द्गद्घशह्म्द्ग शड्ढद्यद्बद्दड्डह्लशह्म्4. ञ्जद्धद्ग द्वशह्म्द्ग ठ्ठह्वद्वद्गह्म्शह्वह्य ड्डठ्ठस्र ह्यह्लह्म्शठ्ठद्द ह्लद्धद्गह्यद्ग ष्शद्यद्यद्गष्ह्लद्ब1द्ग ह्यह्लड्डह्लद्गह्य ड्डह्म्द्ग, ह्लद्धद्ग द्वशह्म्द्ग ह्यह्लह्म्शठ्ठद्दद्य4 द्बठ्ठह्लद्गद्दह्म्ड्डह्लद्गस्र द्बह्य ह्लद्धद्ग ह्म्द्गद्यद्बद्दद्बशह्वह्य ष्शद्वद्वह्वठ्ठद्बह्ल4, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग द्दह्म्द्गड्डह्लद्गह्म् द्बह्लह्य श्चह्म्द्गह्यद्गह्म्1ड्डह्लद्ब1द्ग 1ड्डद्यह्वद्ग. ञ्जद्धद्ग स्रद्गह्लड्डद्बद्यह्य शद्घ स्रशद्दद्वड्डह्य ड्डठ्ठस्र ह्म्द्बह्लद्गह्य ड्डह्म्द्ग ह्यद्गष्शठ्ठस्रड्डह्म्4. ञ्जद्धद्ग द्गह्यह्यद्गठ्ठह्लद्बड्डद्य ह्लद्धद्बठ्ठद्द द्बह्य ह्लद्धड्डह्ल ह्लद्धद्ग4 ड्ढद्ग ष्ड्डश्चड्डड्ढद्यद्ग शद्घ ह्यह्वश्चश्चशह्म्ह्लद्बठ्ठद्द ड्ड ह्यह्वद्घद्घद्बष्द्बद्गठ्ठह्लद्य4 द्बठ्ठह्लद्गठ्ठह्यद्ग ष्शद्यद्यद्गष्ह्लद्ब1द्ग द्यद्बद्घद्ग. एमिल दुर्खाइम के तर्क ये हैं कि धर्म एक सामूहिक जीवन से बांधता है। विश्वासों और प्रथाओं के जरिए एक सामुदायिकता निर्मित होती है जो व्यक्ति को उसके भयावह एकांत से सुरक्षित बाहर निकाल लाती है। लेकिन तुलसी शायद एक कदम आगे ही जाकर कहते हैं कि सीता राम में- अपने पति में- आस्था की धार्मिक स्तर की दृढ़ता के कारण जीवित रहती हैं। ऐसा नहीं कि सीता के जीवन में रावण की कैद के दौरान मानसिक दुर्बलता के क्षण नहीं आए। सो तो रावण की प्रताडऩा के फलस्वरूप एक बार तो वे आत्महत्या पर उतारू हो भी गई थीं। त्रिजटा ने उन्हें बमुश्किल किसी तरह संभाला था। उसके बाद सीता संतुलित हो गर्इं। उसके पूर्व भी थी हीं।


 

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