विधानसभा चुनाव आसन्न होने के कारण यद्यपि इस समय कर्नाटक राजनीतिक दांव पेंच का मुख्य केंद्र बना हुआ है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश में संभावनाओं पर सभी की नजर लगी हुई है। उत्तर प्रदेश से लोकसभा के लिए अस्सी सदस्य चुने जाते हैं। 2014 के निर्वाचन में भारतीय जनता पार्टी ने सहयोगियों के साथ 73 सीटें जीतने में सफलता प्राप्त किया था। कांग्रेस रायबरेली और अमेठी में सिमटकर रह गई थी तथा समाजवादी पार्टी जिसे ''यादव पैंचÓÓ कहा जाता है उससे बाहर नहीं निकल पाई। बहुजन समाज पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव में सहयोगियों के साथ सवा तीन सौ सीटें जीतकर भाजपा ने 2014 के सम्मान को बनाये रखा लेकिन 2018 में हुए लोकसभा के दो-गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में उनकी पराजय के विजयी रथ को रोक दिया। हार का कारण जो भी रहा हो, जीत का कारण बसपा और सपा में आपसी सांठ गांठ के कारण संभव हो सका। बसपा समर्थकों को उपचुनाव में सपा के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित करने का एक मात्र उद्देश्य मायावती को राज्यसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार के लिए समर्थन प्राप्त करना है। सपा द्वारा अतिरिक्त और कांग्रेस संपूर्ण मत देने के बावजूद जीत सुनिश्चित न होने के कारण मायावती स्वयं उम्मीदवार नहीं बनीं। यह उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि वे कोई भी चुनाव हारकर दाग नहीं लगने देना चाहती। मायावती जब मुख्यमंत्री बनी हैं तो विधानपरिषद की सदस्यता प्राप्त कर लेती हैं और उसी से उतरने पर राज्यसभा में चली जाती है। पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 19 सीटें जीतने के कारण उनके लिए राज्यसभा जाना संभव नहीं रह गया इसलिए घोर शत्रु सपा के साथ उन्होंने एक सौदेबाजी की जो सफलता के सोपान पर चढऩे से चूक गईं। लोकसभा के उपचुनाव में मायावती से एकतरफा समर्थन प्राप्त करने के बाद अखिलेश यादव उनके न केवल प्रशस्ति गायन का कीर्तन शुरू कर दिया है जिसमें खांटी समाजवादी भी स्वर में स्वर मिला रहे, बल्कि यह भी पहली बार समाजवादी कार्यालय में अम्बेडकर के पोस्टर बैनर पर मायावती के चित्र को भी डा. राम मनोहर लोहिया तथा अखिलेश यादव के साथ स्थान दिया है। मायावती ने गेस्ट हाउस कांड के लिए अखिलेश को निर्दोष घोषित क्योंकि तब वे नाबालिग थे-राजनीति में नहीं थे-तो अखिलेश ने सदैव के साथ रघुराज प्रताप सिंह को आभार वाला अपना ट्विट निरस्त कर दिया। लेन और देने में हानिरहित मुद्दों पर आगे बढऩे की जो आकुलता दोनों पार्टी की ओर से दिखाई गई, जा रही है-विशेषकर अखिलेश की ओर से ऐसी ही अभिव्यक्ति भारतीय जनता पार्टी ने मायावती को हमवार बनाए रखने के लिए कई बार करने के कारण डेढ़ दशक से ज्यादा उत्तर प्रदेश की राजनीति में चौथे स्थान पर बने रहने का रिकार्ड कायम किया है। मायावती का सिद्धांत है 'लÓ उन्होंने 'दÓ का कभी सबूत नहीं दिया है। क्या समाजवादी पार्टी के साथ इसी का सिद्धांत के अनुरूप 2019 के लिए उनका सम्बन्ध खो गया था फिर गेस्ट हाउस इस कांड के पूर्व मुलायम सिंह यादव को घुटने टेकने के जिस प्रकार बार बार विवश होने की गलानि ने उस कांड को अंजाम दिया वैसा ही कुछ इस बार फिर होगा। क्योंकि अखिलेश यादव कई बार मायावती का दर्शन करने उनके आवास गए  हैं-जैसा मुलायम सिंह यादव कांसीराम से हर बार में उपस्थिति होकर करते थे, लेकिन मायावती एक बार भी ऐसा शिष्टाचार दिखाने का संकेत नहीं दिया है। फिर भी पिछले लोक सभा और विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को मिले मतों को-उपचुनाव में मिलने के कारण-जोड़कर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा केा उपचुनाव के समान ही परिणाम के लिए एक एक विकल्प उभर रहा है। एक आंकलनकर्ता ने तो फार्मूला भी दे दिया। 2014 के निर्वाचन में जो द्वितीय स्थान पर रहा उस पार्टी का उम्मीदवार भाजपा का मुकाबला करेगा। उपचुनाव में एकल चलकर जमानत भी गवां चुके कांग्रेस को भी इस भाजपा हराओ अभियान में स्थान मिलने की संभावना व्यक्त करते हुए कुछ लोगों ने सीटों का बंटवारा भी कर दिया है। सपा-बसपा 30-30 और कांग्रेस 20 स्थानों पर चुनाव लड़ेगीं जहां विरोधी दलों में तालमेल गठबंधन या सामंजस्य की संभावना को लेकर अनुमानों का दौर चल रहा है वही भाजपा अध्यक्ष ने आगे होने वाले सभी निर्वाचनों में पचास प्रतिशत मत प्राप्त करने का लक्ष्य घोषित किया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में 42 प्रतिशत मत प्राप्त कर उसने 73 सीटों पर कब्जा किया था। भाजपा की ''दयनीयताÓÓ और सपा-बसपा ''मुगलमताÓÓ की तात्कालिक मानसिकता के स्थायित्व का अनुमान लगाने में अतीत को नजरंदाज नहीं किया जा सकता, जैसा हो रहा है। मायावती और अखिलेश यादव दोनों ही वर्गीय मतदाताओं में वरचस्व रखे हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अप्रासंगिक हो चुकी है। उसे रायबरेली और अमेठी के अलावा किसी सीट की गठबंधन से उम्मीदवार नहीं करने चाहिए। एक महत्वपूर्ण पक्ष है मुस्लिम मतदाताओं की जो भाजपा विरोधी है और भाजपा विरोधियों में एकजुटता के साथ जुटना चाहती है। मोदी ओर योगी की नियत पर भरोसा अटूट रहना भाजपा का सबसे प्रबल पक्ष है। लेकिन इस भरोसे को मजबूत राने के लिए मध्यम वर्ग में बढ़ रही उदासीनता को दूर करना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए जो घटने के बजाय बढ़ रही है। गोरखपुर और फूलपुर में मतदाताओं की उदासी बताकर और कार्यकर्ताओ की प्रगल्भता तथा नेतृत्व का सही आंकलन दुरूस्त उसी प्रकार करना होगा जैसे गुजरात विधानसभा चुनाव में पहले दौर के मतदान का आंकलन कर दूसरे दौर में सुधाकर सत्त में बने रहने में सफलता प्राप्त किया है।
भाजपा को सफलता से रोकने के लिए जिस प्रकार कर्नाटकों में क्षेत्रीय वर्गीय जातीय और साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारा जा रहा है, उसका भाजपा का सबका साथ सबका विकास का अभियान जो 2014 से सफलता का आधार बना हुआ है, की विश्वसनीयता की कर्नाटका में तो परीक्षण हो ही रहा है जहां से अमित शाह ने पचास प्रतिशत मत पाकर सत्ता में आने की रणनीति बनाई है, अगला प्रयोग 2019 स चुनाव में सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में होना है, यदि सपा-बसपा के बीच तालमेल हो जाता है तो मायावती के अब तक जो संकेत दिए हैं तथा जैसा उनकी अतीत में आदत का ब्यौरा है, वे द्वितीय स्थान पर रहने की अभ्यस्त नहीं हैं। और प्रथम स्थान पर पहुंचने के लिए अखिलेश यादव ने कुनबे को जैसा समेटा है, उससे उनकी आकांक्षाओं का भी संकेत मिलता है। आकांक्षाओं के लिए टकराते ही रहने के इन दो खिलाडिय़ों में कप्तानी के लिए ठन जाने की संभावना के साथ-साथ जिस वर्गीय वरचस्व का दोनों को श्रेय दिया जाता है, उनमें परंपरागत टकराव भी एक समस्या है जिसका समाधान ऊपरी एकता जो सदैव कैडर की बलि का कारण बनती है-करने की चुनौती के सामना सहज नहीं होगा। अभी के सुहावने बोल आने वाले दिनों की पैंतरेबाजी की भूमिका के रूप में देखना जाना अतीत के इतिहास को देखते हुए यदि 1995 की घटना क्रम के रूप में देखा जाय जिसका समापन गेस्ट हाउस कांड और मुलायम सिंह के सत्ताच्युत हो जाने के रूप में प्रगट हुआ। यही कहा जा सकता है कि यह बेमेल समझौता परवान चढऩे वाला नहीं है। लेकिन अस्तित्व के लिए जिस परिस्थिति में 1993 में मुलायम सिंह और कांसीराम में समझौता हुआ था, उसके बाद की परिस्थितियों का संज्ञान लिया जाय तो यह कहा जासकता है कि यदि दोनों मिलकर 1993 के समान ही भाजपा को पछाड़ भी देते हैं तो प्रदेश दो दशक तक जिस चील्ह छप्पटे का शिकार रहकर पिछड़ा गया है, उसी की पुनरावृत्ति सुनिश्चित है। भाजपा के लिए जिसे 2017 के निर्वाचन में अभूपूर्व सफलता मिली है, घोषित क्रियाकलापों को अमलीजामा पहनाने की चुनौती का उत्तर देना होगा। इसके बिना वह विपक्ष की मिली या बिखरी चुनौती का सामना नहीं कर सकेगा। मयावती ने राज्यसभा चुनाव परिणाम के बाद जो बात कर दिया है उसे ही गठबंधन का आधार माना जा रहा है जबकि उन्होंने बड़ी सावधानी के साथ गठबंधन शब्द का एक बार भी उपयोग नहीं किया लेकिन दो महत्वपूर्ण बातें कही हैं। एक यह कि उनकी पार्टी का कैडर अब किसी भी उपचुनाव में किसी उम्मीदवार के लिए काम करने के बजाय बूथ स्तर पर सर्वसमाज में अपनी मजबूती के लिए काम करेगा और दूसरा अखिलेश यादव भी अनुभवहीन हैं उन्हें बहुत कुछ सीखना है। इसके लिए निहितार्थ क्या है?

                                                                                                                                                                      राजनाथ सिंह 'सूर्यÓ

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