पश्चिम गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव के परिणाम ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों के मन में उम्मीदें जगा दी हैं। बसपा-सपा के बेमेल गठजोड़ को जो सफलता मिली, उससे बाकी मोदी विरोधियों के मन में अरमान जाग उठे हैं। एकजुट होने के लिए यह लोग एक-दूसरे का भरोसा दिला रहे हैं कि मोदी को हराया जा सकता है। यह बात तो सही है कि हराया तो किसी को भी जा सकता है। किंतु, प्रश्न यह है कि मोदी को हराने के लिए सभी राजनीतिक दलों में इतनी बेचैनी क्यों है? संभव है कि मोदी के विरुद्ध एकजुट होकर कथित तीसरा मोर्चा एक ताकत बनकर २०१९ के चुनावी मैदान में उतरे। तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि इस एकजुटता का लाभ तीसरे मोर्चे से कहीं अधिक नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी को मिल सकता है। क्योंकि, देश की जनता में यह चर्चा तो है ही कि आखिर क्या कारण है कि सब दल मोदी को हराने के लिए एक हो रहे हैं? इस प्रश्न और उसके इर्द-गिर्द हो रही चर्चा मोदी के समर्थन में जनता को एकजुट कर रही है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के बढ़ते जनाधार से डरी हुई तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी प्रधानमंत्री मोदी को अपने राज्य से दूर रखने के लिए राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें उलझाने का प्रयास कर रही हैं। बंगाल को जलता हुआ छोड़ कर आजकर वह दिल्ली में डेरा जमा कर सभी मोदी विरोधियों से मिल रही हैं और उन्हें एकसाथ आने के लिए कह रही हैं। दरअसल, वह सोच रही हैं कि उनके इन प्रयासों से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस एकजुटता की काट ढूंढऩे में व्यस्त रहेंगे तो पश्चिम बंगाल को जीतने की रणनीति पर अधिक ध्यान नहीं दे पाएंगे।   हालाँकि अभी तो इसी बात पर भरोसा करना कठिन है कि नरेन्द्र मोदी विरुद्ध शेष सभी मिलकर एक मोर्चा बना पाएंगे। क्योंकि, इस मोर्चा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न नेतृत्व का है। तीसरे मोर्चा का नेतृत्व करेगा कौन? क्या कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का नेतृत्व क्षेत्रीय पार्टियों के दिग्गज एवं वरिष्ठ नेता स्वीकार कर पाएंगे? क्या वे सब राहुल गांधी को आगे कर उनके पीछे चल पाएंगे? साझे विपक्ष की स्थिति ऐसी है कि थोड़े-थोड़े समय पर कोई एक नेता आता है और वह सबको एकजुट कर उनका नेतृत्व करने की भूमिका में दिखाई देता है। अभी इस भूमिका में ममता बनर्जी दिखाई दे रही हैं। वह पूरी सक्रियता से सबको साधने का प्रयास कर रही हैं। साझे विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए सबसे अधिक गंभीरता से अब तक नीतीश कुमार का नाम चला है। किंतु, खुलकर स्वीकार्यता नहीं मिली तो उन्होंने भी अपने कदम पीछे खींच लिए और भाजपा के साथ जाकर खड़े हो गए। टीआरएस अध्यक्ष चंद्रशेखर राव का नाम भी सामने आता है। परंतु, मोदी विरोधी दल एकमत नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए, विपक्षी एकता की राह भी कठिन दिखाई देती है। मोदी विरोधियों के साथ आने के अभी जितने प्रयास हो रहे हैं, २०१९ के निकट आने पर बिखरे दिखाई देंगे। यदि विपक्ष एकजुट हो भी जाएगा, तब भी यह 'भानुमती का कुनबाÓ अपनी वैचारिक और सैद्धांतिक दरारों के कारण बहुत कमजोर होगा। 

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