हाल ही प. बंगाल दो मुख्य कारणों से चर्चा में रहा। पहली- रामनवमी के उपरांत जुलूस निकालते समय प्रदेश के आसनलोस, रानीगंज सहित कुछ क्षेत्रों में भड़की सांप्रदायिक हिंसा। और दूसरी- फिल्म अभिनेत्री कोयना मित्रा द्वारा ममता सरकार पर विदेशी रोहिंग्या मुस्लिमों को प्रदेश में शरण देने का आरोप। भले ही दोनों घटनाक्रमों का प्रसंग भिन्न हो, किंतु इनका आपस में बहुत ही गहरा संबंध है। क्या इन दोनों घटनाओं के मूल कारण में देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाले तत्व, इस्लामी कट्टरवाद का पोषण और विकृत सेकुलरवाद निहित नहीं है? गत दिनों रोहिंग्या मुस्लिमों को पश्चिम बंगाल में शरण देने को लेकर फिल्म अभिनेत्री कोयना मित्रा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। उन्होंने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इसे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। कोयना ने 23 मार्च को किए अपने ट्वीट में लिखा, 'आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होने के कारण म्यांमार और श्रीलंका से रोहिंग्या भगाए जा रहे हैं। जबकि प.बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उन्हें जमीन देकर बसाने में मदद कर रहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक है, इसका विरोध करना चाहिए।Ó इसे लेकर ट्विटर पर फिल्म अभिनेत्री और पूर्व राज्यसभा सांसद शबाना आजमी, कोयना से भिड़ गई। साधारण जीवन की भांति हमारे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भी कई विरोधाभास है। जिन लोगों की सहानुभूति आज रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए दृष्टिगोचर है और मानवता के नाम पर इन विदेशी नागरिकों को भारत में शरण देने की वकालत कर रहे है- क्या उन्होंने पांच लाख कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीडऩ पर अपनी आवाज बुलंद की? इस जमात की संवेदना को पाखंड ही कहा जाएगा- जिसमें पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी सहित अधिकतर स्वघोषित सेकुलरिस्ट देश में मुस्लिमों में 'असुरक्षा की भावनाÓ और 'असहिष्णुताÓ का प्रचार कर देश की छवि को विश्व में कलंकित करने का प्रयास करते है, तो यही लोग विदेशी धरती पर कथित अन्याय के शिकार हुए मुसलमानों के लिए भारत को सुरक्षित बताकर उन्हे यहां बसाने की मांग करने लगते है। क्या इस दोहरे मापदंड का कारण सत्तारुढ़ भाजपा और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनका वैचारिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत विरोध नहीं है? रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने के केंद्र के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष केंद्र सरकार का स्पष्ट कहना है, 'न्यायालय उनको बाध्य नहीं कर सकता कि रोहिंग्या मुसलमानों को भारत आने दिया जाए। जिनके पास वैध यात्रा प्रमाणपत्र होगा, केवल उन्हीं को भारत आने की अनुमति होगी और यदि रोहिंग्या मुसलमानों बिना वैध यात्रा प्रमाणपत्र के भारत आते है, तो वह राष्ट्रहित के विरुद्ध होगा।Ó सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 40 हजार से अधिक रोहिंग्या मुस्लिम असम, प.बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं- जिसमें 16,000 संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के रूप में पंजीकृत हैं। 
रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर देश-विदेश के कई स्वयंभू बुद्धिजीवी-उदारवादी भारत को उन यूरोपीय देशों की नीतियों का अनुसरण करने का परामर्श देते है, जिन्होंने मानवता के नाम पर गृहयुद्ध से ग्रसित सीरिया, इराक, लीबिया, सोमालिया, सूडान आदि मुस्लिम देशों के लोगों को पनाह दी। क्या यह सत्य नहीं कि विस्थापितों को शरण देने के बाद उन्हीं यूरोपीय देशों में न केवल आतंकी हमले बढ़ गए, साथ ही कानून-व्यवस्था का स्वरुप भी बिगड़ गया- जिसमें लूटपाट, छेडख़ानी, बलात्कार, हत्या के मामलों में एकाएक बढ़ोतरी हो गई? 
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोहिंग्या मुस्लिम स्वयं को म्यांमार में उत्पीडि़त और असुरक्षित बताते है। कटु सत्य तो यह है कि मुसलमानों का बड़ा वर्ग ना ही म्यांमार में, ना ही भारत में और ना ही शेष विश्व के किसी भी कोने में सुरक्षित अनुभव करता है। वर्ष 1947 में बहुसंख्यक हिंदुओं से जिस असुरक्षा की भावना के कारण भारत का रक्तरंजित विभाजन हुआ, उसी भावना के शिकार बौद्ध बहुल म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम भी है। विश्व के जिस क्षेत्र में मुस्लिम बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक है- वहां के अधिकतर लोग गैर-मुस्लिमों के बराबरी के साथ रहने में 'असुरक्षा का अनुभवÓ क्यों करते है? आखिर क्यों कालांतर में वह क्षेत्र गैर-मुस्लिम गतिविधियों से तनावग्रस्त हो जाता है? रामनवमी के समय प.बंगाल क्यों सांप्रदायिक हिंसा की ज्वाला धधक उठी? 
जब देश मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्मदिवस- रामनवमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मना रहा था, तब प.बंगाल के कुछ क्षेत्र हिंसा की चपेट में आ गए। पुरुलिया में रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा में एक की मौत और डीएसपी सहित पांच लोग घायल होने के बाद गत सोमवार को बद्र्धमान के रानीगंज तो मंगलवार को आसनसोल में जुलूस पर पथराव किया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को आसनसोल में एक महिला सहित दो लोगों की मौत की खबर है। 
बताया जा रहा है कि जब सोमवार को शांतिपूर्ण ढंग से विभिन्न स्थानों से होते हुए रामनवमी शोभायात्रा श्रीसीतारामजी भवन पहुंच रही थी, तब मुस्लिम बहुल राजपारा में कुछ लोगों ने जुलूस में शामिल लोगों को भजन गाने से रोकने का प्रयास किया। साथ ही राजारबांध मोड़ के पास दूसरे संप्रदाय ने पथराव शुरू कर दिया और देखते-देखते ही पूरा क्षेत्र बम और गोलियों की आवाज से गूंज उठा। यहां हुई हिंसा में पचास वर्षीय महेश मंडल की मौत हो गई। हिंसा के दौरान हिल बस्ती, शिव मंदिर मार्ग आदि में कई घरों में अराजक तत्वों ने लूटपाट की और मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया। सब्जी मंडी को फूंक दिया। पुलिस बल का नेतृत्व कर रहे आसनसोल मुख्यालय के पुलिस उपायुक्त अरिंदम दत्ता चौधरी का दाहिना हाथ (कोहनी से लेकर हथेली तक) बम से उड़ा दिया। अराजक तत्वों की गुंडागर्दी प.बंगाल तक सीमित नहीं रही, झारखंड से भी संबंधित खबरें सामने आई। यहां के गढ़वा में रामनवमी जुलूस में शामिल होकर वापस लौट रहे लोगों की दूसरे समुदाय के लोगों ने पिटाई कर दी।  सार्वजनिक विमर्श में रामनवमी पर आसनसोल-रानीगंज में भड़की हिंसा के मूल कारणों पर निष्पक्ष चर्चा ही नहीं हो रही है। उलटा प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन लोगों या हिंदुवादी संगठनों को सांप्रदायिक बता रही हैं, जो रामनवमी जुलूस में शामिल हुए थे। आखिर क्यों कुछ भारतीय नागरिकों को बहुसंख्यकों के पर्व और उनकी परंपराएं, भजन और माथे पर तिलक से इतनी घृणा है कि वह 'जय श्रीरामÓ का नारा लगाने वालों पर गोलियां और बम बरसाना प्रारंभ कर देते है? क्या इस असहिष्णुता की जड़ें मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग द्वारा स्थापित उनके ब्रैंड के इस्लाम व साहित्यों में नहीं मिलती है?  पाकिस्तान की मांग के पीछे एक विषाक्त मानस था, जिसकी उत्पत्ति के लिए जहां एक ओर अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति (फूट डालो, राज करों) थी, वही दूसरी तरफ हिंदू समाज का वह इस्लाम मतांतरित हिस्सा था, जो कालांतर में इस्लामी पहचान को स्थापित करने के लिए अपने मूल अस्तित्व से घृणा कर रहा था। इसी भटके समाज को वामपंथियों ने अपना बौद्धिक चोला पहनाकर देश को दो टुकड़ों में बांट दिया। भले ही अंग्रेज 70 वर्ष पूर्व भारत छोड़कर चले गए हो, किंतु रुग्ण वामपंथी चिंतन और मुस्लिम अलगाववाद के दंश से भारत आजतक मुक्त नहीं हो पाया है। कालांतर में कासगंज कांड के बाद रानीगंज सांप्रदायिक हिंसा- इसी विषैले संयोजन का परिणाम है। रामनवमी पर प.बंगाल की सांप्रदायिक हिंसा और विदेशी रोहिंग्या-बांग्लादेशी मुस्लिमों से सहानुभूति- उन विकृत नीतियों का ही परिणाम है, जिसे स्वयंभू सेकुलरिस्ट गत सात दशकों से वोटबैंक के लिए सेकुलरवाद के नाम पर देश में स्थापित कर रहे है। इसी विकृति ने कश्मीर, केरल के कई क्षेत्रों के बाद अब प.बंगाल को भी भयावह स्थिति में पहुंचा दिया है। जबतक सेकुलरवाद के नाम पर जिहादी और कट्टरवादी मानसिकता को राजनीतिक आशीर्वाद मिलता रहेगा- तबतक आसनसोल-रानीगंज जैसी घटनाएं रुकेगी नहीं।

                                                                                                                                                                 बलबीर पुंज

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