ज्यादा दिन नहीं हुए, जब पिछले महीने 10 जनवरी को मालदीव के विदेश मंत्री मोहम्मद असीम तीन दिन की यात्र पर नई दिल्ली आए थे। तब उन्होंने सोचा भी नहीं रहा होगा कि 22 दिन बाद उनके देश में सब कुछ उलट-पुलट होने वाला है। दुनिया में संभवत: इस तरह की यह पहली घटना है, जब एक सरकार को अदालत द्वारा सत्ता पलट का डर सताए। डर भी इतना कि सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक दूसरे जज अली हमीद गिरफ्तार कर लिए जाएं। दो और जज अभी लापता हैं। मालदीव में 15 दिन के आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। संसद सत्र स्थगित है। सेना और प्रशासन को आदेश है कि कोर्ट के किसी भी निर्देश का वे पालन न करें। मालदीव के अटार्नी जनरल को शक था कि संसद में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव कभी भी आ सकता है। महाभियोग के डर से एयरपोर्ट पर ही 12 सांसद गिरफ्तार कर लिए गए। उसके बाद संसद सत्र को स्थगित कर दिया गया। इसी 1 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार सांसदों को रिहा करने, पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के विरुद्ध मामले को रद्द करने का आदेश दिया था। मालदीव में नवंबर 2018 तक चुनाव होने हैं। अनुकूल स्थिति बनी, तो संभव है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की देख-रेख में समय से पहले भी चुनाव हो जाएं। इस घटनाक्रम के बाद नशीद के लिए वतन वापसी और चुनाव लडऩे की राह आसान हो गई है।मालदीव के चौथे राष्ट्रपति नशीद 11 नवंबर, 2008 से 7 फरवरी, 2012 तक सत्ता में रहे थे। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 2010 में उनकी पहली भिड़ंत वहां की भ्रष्ट न्यायपालिका और पर्यटन माफिया से हुई। इसके पीछे पूर्व राष्ट्रपति गयूम थे, जिन्होंने 25 साल तक इस मुल्क पर शासन किया था। महमून अब्दुल गयूम के हुजरे से राजनीति बाहर हुई, तो भारत उनका दुश्मन नंबर वन हो गया। नशीद पर आरोप लगा कि उन्होंने 16 जनवरी, 2012 को राष्ट्रपति पद पर रहते हुए क्रिमिनल कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद को 22 दिनों तक एक सैनिक कैंप में हिरासत में रखा था। जज को ‘बंधक’ रखने से हुए बवाल के बाद 7 फरवरी, 2012 को नशीद ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। दरअसल, राष्ट्रपति नशीद पर पुलिस और सेना का दबाव बनाकर इस्तीफा लिया गया था, जिसके बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए उनको माले के भारतीय उच्चायोग में शरण लेनी पड़ी थी। इस हाई वोल्टेज ड्रामा के पीछे मकसद नशीद को चुनाव लडऩे से वंचित करना था। इस साजिश का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ। मालदीव को कॉमनवेल्थ की सदस्यता से सस्पेंड कर दिया गया। कॉमनवेल्थ समर्थित न्यायिक आयोग की 80 पेज की रिपोर्ट में मालदीव में भ्रष्ट अदालत, सरकार और सुरक्षा तंत्र के गठजोड़ का असली चेहरा सामने आया। अंतत: 2013 में आम चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हुई। 17 नवंबर, 2013 को अब्दुल्ला यामीन चुनावी हेराफेरी कर सत्ता पर काबिज हो गए। सत्ता न तो वहीद हसन के पास थी, न नशीद के पास। 2015 में जज को बंधक रखने के गड़े हुए मामले को एक बार फिर अदालत में लाया गया। यह कंगारू कोर्ट था, जिसके आदेश पर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद गिरफ्तार कर लिए गए। मालदीव में इसके विरुद्ध लोग सडक़ों पर उतर आए, सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं, जिसमें प्रतिपक्ष के नेता भी थे। 2016 में मानवाधिकार आयोग और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद नशीद को इलाज के वास्ते ब्रिटेन जाने की अनुमति मिल गई। ब्रिटेन ने उन्हें राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा दे दिया। फिलहाल नशीद कोलंबो में हैं। राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन पर संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, कॉमनवेल्थ नेशंस, अमेरिका, ब्रिटेन समेत भारत का दबाव है कि वह कोर्ट के आदेश का पालन करें, और नशीद को माले आने दें। राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन इतनी आसानी से हथियार डाल देंगे, ऐसा नहीं लगता। मालदीव की आज की परिस्थितियां भी 30 साल पहले से बिल्कुल भिन्न हैं। नवंबर 1988 में श्रीलंका से आए पीपुल्स लिबरेशन ऑफ तमिल इलम (प्लोटे) के 80 से 200 अतिवादियों ने तत्कालीन राष्ट्रपति महमून अब्दुल गयूम की सत्ता को पलटने का प्रयास किया था और माले में 27 लोगों को बंधक बना लिया था, जिसे भारत सरकार ने विफल कर दिया था। तब भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे और उनके आदेश से मात्र 1,600 भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी ने ‘ऑपरेशन कैक्टस’ को अंजाम दिया था। उस समय दिएगोगार्सिया स्थित अमेरिकी मरीन, ब्रिटिश फोर्स भी भारतीय सेना को को-ऑर्डिनेट कर रही थी।अब की परिस्थितियां भिन्न हैं। इस समय मालदीव में सरकार बचाना नहीं, वहां एक निरंकुश सरकार का निषेध कर लोकतंत्र की वापसी सबसे बड़ा टास्क है। इस टास्क में सबसे बड़ा अवरोधक चीन है। राजनीतिक अस्थिरता और विप्लवकारी परिस्थितियों का लाभ उठाना चीन की फितरत है। यह नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका समेत मालदीव में भी देखा जा सकता है। ध्यान से देखिए, तो दक्षिण एशिया के इन देशों में चीन की सबसे पहली कोशिश सामरिक महत्व वाले इलाके में जमीन हथियाना रहा है। मालदीव में जो कुछ 2014 से चल रहा था, उसे दरकिनार कर हम चादर क्यों ओढ़े रहे? यह एक बड़ा सवाल है। अगस्त 2017 में चीनी नौसेना के तीन जहाजों ने जब माले पोर्ट पर लंगर डाला, तब अचानक से हमारी नींद खुली। 2014 में राष्ट्रपति शी का माले आना और उनके समकक्ष अब्दुल्ला यामीन का पेइचिंग जाना ‘मेरीटाइम सिल्क मार्ग’ को प्रशस्त कर चुका था। चीन-मालदीव के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट तक तो निगलने लायक स्थिति थी। मगर सबसे खतरनाक काम 22 जुलाई, 2015 को मालदीव की संसद में हुआ था, जब विदेशी निवेशकों को जमीन पर हक देने संबंधी संशोधन विधेयक पास कर दिया गया। यह सब कुछ चीन के लिए किया जा रहा था। चीन इसी बिल के बिना सामरिक महत्व वाले सोलह द्वीपों को लीज पर ले चुका है। यूं राष्ट्रपति यामीन ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को आश्वासन दिया था कि मालदीव ‘डिमिलिटराइज्ड जोन’ बना रहेगा। हालांकि यह बात कहने भर की है। इन चार वर्षो में चीन ने मालदीव में जिस तरह से पैर जमा लिए हैं, उसे हिला पाना नए निजाम के लिए आसान नहीं होगा।

 

                                                                                                                                                             पुष्परंजन

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