भारतीय वदेश मंत्री सुषमा स्वराज की नेपाल यात्रा कितनी सफल रही?, कितनी विफल रही। नेपाल का चीनी और पाकिस्तान करण रोकने मे उनकी यह यात्रा कितनी सफल हुई है? क्या भारत भविष्य में 1950 की संधि की समीक्षा करना पसंद करेगा? क्या नेपाल के कम्युनिस्ट और माओवादी सत्ता के दौरान भारतीय हित सुरक्षित रहेगे? क्या चीन, पाकिस्तान की तरह नेपाल भी भारत के लिए खतरनाक पडोसी साबित होगा? भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की नेपाल यात्रा समाप्त हो चुकी है, परमपरा का पालन करते हुए सुषमा स्वराज ने अपनी नेपाल यात्रा की कामयाबी बतायी है और उन्होंने कहा है कि उनकी यात्रा से भारत-नेपाल के संबध मजबूत हुए हैं, भारत एक शक्तिशाली, विकसित और समृद्ध नेपाल देखना चाहता है, भारत की यह समझ अपने पडोसियों के प्रति ईमानदारी और सहिष्णुता को प्रदर्शित करती है। सुषमा स्वराज की इस यात्रा के दौरान भावी प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी, मौजूदा प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और माओवादी नेता प्रंचड से मुलाकात हुई। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और नेपाली नेताओं ने नेपाल में राजनीतिक स्थिरता और विकास के संबंध में बातें हुई हैं। नेपाली नेताओं ने भारतीय विदेश मंत्री से सिर्फ इतना ही कहा है कि नेपाल की राजनीतिक स्थिरता और विकास के परिपेक्ष्य में भारत की भूमिका सकारात्मक होनी चाहिए। जगजाहिर तौर पर भारत नेपाल के साथ मधुर संबंध चाहता है, भारत और नेपाल के बीच जो संबंध है वह आज के दौर के नहीं है बल्कि भारत की आजादी के पूर्व के दौर के हैं। साथ ही साथ भारत और नेपाल के बीच 1950 की वह संधि भी है जो दोनो देशों के मजबूत संबंधों की गारंटी लेती है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि दोनों देशों के नागरिकों को पासपोर्ट विहीन रोजगार का अवसर प्रदान करती है। फिर भी आज के दौर में नेपाल और भारत के संबंध वैसे नहीं है जो कभी हुआ करते थे। जब से माओवाद की उपज हुई है, जब से माओवाद नेपाल की राजनीति के प्रमुख तत्व बन गया है तबसे भारत की चिंताएं खतरनाक हुई हैं, भारत के सामने नेपाली चुनौतियां खतरनाक हुई है, नेपाली माओवादियों और अन्य कम्युनिस्टवादियों के खतरनाक बोल ज्यादा ही भारत के हितों को लहूलुहान करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जब-जब नेपाल पर संकट आये हैं तब-तब भारत ही संकटमोचन के तौर पर खडा रहा है। 
  अब यहां यह प्रश्न उठता है कि भारत की प्रमुख चिंताएं कौन-कौन सी हैं जिसकों साधने के लिए सुषमा स्वराज नेपाल की यात्रा पर गयी थी। जब भारत की चिंताओं को देखेंगे तब आपको स्पष्ट हो जायेगा कि भारत की प्रमुख चिंता नेपाल का चीनी और पाकिस्तानी करण है। नेपाल का राजनीतिक संवर्ग चीनी और पाकिस्तानी करण की सभी हदें पार कर रहे हैं, ऐसा इसलिए संभव हुआ है कि नेपाली कांग्रेस जो काफी हद तक संतुलन बना कर चलने में विश्वास करती थी वह खुद राजनीतिक तौर पर बेअसर साबित हुई है, नेपाली कांग्रेस के अंदर सत्ता संघर्ष और सत्ता के दौरान जनविरोधी नीतियों के कारण जनता का विश्वास डिगा था। इसका सीधा असर नेपाल के संसदीय चुनाव पर पडा, संसदीय चुनाव में नेपाली कांग्रेस हाशिये पर खडी हो गयी। जनता ने माओवादियों और कम्युनिस्टों के गठबंधन को विश्वास मत दे दिया। अब माओवादी और वामपंथ गठबंधन नेपाल के भाग्यविधाता होंगे। केपी शर्मा ओली नेपाल के अगले प्रधानमंत्री होंगे। केपी शर्मा ओली तो माओवादी नहीं है और प्रंचड की तरह हिंसक और बर्बर भी नहीं हैं पर केपी शर्मा ओली भारत समर्थक भी कदापि नहीं है, केपी शर्मा ओली के भारत विरोधी हरकतें जगजाहिर है। केपी शर्मा ओली भारत विरोध का कोई अवसर नहीं छोडते हैं। उनकी समस्या यह है कि वह चाहते हैं कि भारत अपने हितों को बलि देकर उनकी पार्टी का समर्थन करे। जबकि भारत की सत्ता व्यवस्था को ऐसी इच्छा का पालन करना संभव नहीं है। भारत की सत्ता व्यवस्था को अपने हित की भी चिंता है। भारत की सभी सरकारें हमेशा कोशिश करती रही है कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियां राजनीतिक स्थिरता को सुनिश्चित करें और साधनहीन नेपाल में सकारात्मक परिवर्तन को सुनिश्चित करें। भारत की यह इच्छा और भारत की यह पहल नेपाल की राजनीतिक प्रक्रिया को नगावर गुजरती है।
भारत के हितों को नेपाल में बलि चढाने की राजनीतिक प्रक्रिया कभी रूकती नहीं है, ऐसा तब भी होता है जब भारत सरकार कोई हस्तक्षेपकारी नीति अपनाती नहीं है। सबसे बडी बात यह है कि नेपाल पर जब-जब संकट आये हैं, भारत ने दिल खोलकर मदद किये हैं और भारत ने बडे भाई होने की जिम्मेदारी निभायी है। नेपाल में आये भूकम्प एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था। जब नेपाल में हाहाकारी और विनाशकारी भूकम्प आया था और नेपाल में बडी तबाही हुई थी, नेपाल में सैकडों लोग मारे गये थे, नेपाल में हजारों लोग बेघरबार हो गये थे, नेपाल का पुर्निर्माण की जरूरत थी, गरीबी और फटेहाली पसरी हुई थी, पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पहले से ही खराब थी, माओवादी हिंसा के कारण पर्यटन की अर्थव्यवस्था चौपट थी, ऐसी स्थिति में नेपाल भूकम्प से हुए नुकसान की भरपाई कर नहीं सकता था। बेधरबार हुए लोगों को फिर से बसाया नहीं जा सकता था। भूकम्प से हुए नुकसान की भरपाई के लिए नेपाल को अंतर्राष्टीय स्तर पर सहायता की जरूरत थी, सहयोगी की जरूरत थी। दुनिया की नेपाल में कोई दिलचस्पी थी नहीं। दुनिया में नेपाल की कूटनीति कोई महत्व नहीं रखती है। ऐसी स्थिति में नेपाल को अतंर्राष्टीय मदद कहां से मिलती। ऐसी संकट स्थिति में भारत तन, मन और धन से आगे आया। कई हजार करोड की मदद दी। मदद लेकर खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नेपाल गये थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल जाकर भूकम्प से हुए नुकसान की भरपाई के लिए योजनाएं बनायी। भारत सरकार ने क्षतिग्रस्त हुए सडके बनवायी। फलैट बना कर दिये। नेपाल के आम नागरिक भूकम्प से हुए नुकसान की भरपाई में भारत सरकार की वीरता की प्रशंसा करते हैं। पर राजनीतिज्ञ को भारत सरकार की यह वीरता कोई अर्थ नहीं रखती है।
चीन ने माओवाद को खडा किया था। माओवादी नेता प्रचंड चीन का मोहरा है। अन्य कम्युनिस्ट पार्टियां भी चीन से डरती है और चीन के कहने पर भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देती है और भारत विरोधी नीतियां बनाती हैं। चीन ने भारत के हितों को बलि चढाने की पूरी कोशिश की है। चीन नेपाल की कई योजनाओं को अंजाम दे रहा है। जिसमें सिंचाई और बिजली की योजनाएं भी शामिल है। चीन इन योजनाओं का विकास नेपाल के विकास के दृष्टिकोण से नहीं कर रहा है बल्कि भारत के विध्वंस के लिए कर रहा है। चीन सिंचाई और बिजली योजनाओं का विकास भारत को बाढग्रस्त बनाने के लिए कर रहा है। उल्लेखनीय है कि वर्षा के समय नेपाल की नदियों से आया पानी और बाढ बिहार और उत्तर प्रदेश के हिस्से में भयंकर बाढ आती है और क्षति होती है। अगर भारत ने चीनी की इस कुदृष्टि पर नजर नहीं रखी थी तो फिर भारत को बाढ की भयंकर समस्या से जुझना पड सकता है। सिर्फ चीन ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की भी नेपाल में दिलचस्पी बढी है। पाकिस्तान की आईएसआई पूरी तरह नेपाल में सक्रिय है। भारत में आतंकवादियों की घुसपैठ नेपाल के रास्ते से हो रही है। कई पाकिस्तान आतंकवादी नेपाल में पकडे भी गये हैं। नेपाल के रास्ते आने वाले कई पाकिस्तानी आतंकवादी भी पकडे गये हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय नेपाल से भारतीय विमान का पाकिस्तान के आतंकियों ने अपहरण कर लिया था। विमान को मुक्त कराने के लिए भारत को आतंकवादियेां को छोडना पडा था। इसके अलावा पाकिस्तान नेपाल का इस्लामिक करण करना चाहता है जो भारत के लिए घातक होगा।
संवैधानिक समस्या दूर नहीं हुई है। नेपाल का संविधान मधेशियों के साथ भेदभव करता है। मधेशियों ने सविंधान के खिलाफ बडा आंदोलन किया था। नेपाल की पुलिस और सेना ने संविधान विरोधी मधेशियों को गोलियों से भूना था। करीब सौ से अधिक मधेशी नागरिक मारे गये थे।

                                                    

                                                                                                                                                                      विष्णु गुप्त

विदेश