क्या वह शक्ति अन्ना हजारे की नहीं थी? क्या अन्ना की वह शक्ति परजीवी थी? क्या अन्ना की वह शक्ति किसी अदृश्य शक्ति पर आधारित थी? क्या अन्ना की वह उफान किसी अन्य हिस्सेदारी से उत्पन्न हुई थी ? अगर नहीं तो फिर अन्ना हजारे के इस आंदोलन और अभियान में वह जोश-आक्रोश क्यो नहीं दिख रहा है, वह जोश और आक्रोश क्यों विलुप्त हो गया? अन्ना हजारे के इस आंदोलन और अभियान में वह भीड क्यों नहीं दिखायी दे रही है, वह भीड क्यों समाप्त हो गयी? अन्ना के उस आंदोलन और अभियान से देशव्यापी  उफान उठा था, जो राजनीतिक बंवडर उठा था वह दम क्यों तोड दिया? इस बार अन्ना हजारे के आंदोलन और अभियान में वह भीड फिर क्यों नहीं आकर्षित हुई? अन्ना हजारे के इस आंदोलन और अभियान से मीडिया सक्रियता के साथ दिलचस्पी क्यों नहीं ले रही है, क्या अन्ना का वह आंदोलन और अभियान मीडिया की देन थी? अन्ना के इस बार के आंदोलन और अभियान में युवाओं की सक्रियता क्यों सीमित हो गयी? क्या अन्ना के इस आदोलन और अभियान ने युवाओं को आकर्षित करने में विफलता हासिल किया है? युवाओं के अन्ना के साथ जुगलबदंी क्यों नही बन पायी? युवाओं की सक्रियता इतनी जल्द कैसे और क्यों जमीदोंज हो गयी? अन्ना के इस आंदोलन और अभियान से नरेन्द्र मोदी सरकार उस तरह से क्यों नहीं डरी जिस तरह से मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी की सरकार डरी थी और जन विश्वसनीयता खोयी थी। अन्ना की कांग्रेस और सेक्युलर जमात के साथ कथित निकटता अन्ना की विश्वसनीयता को तार-तार कर देगी। अगर अन्ना इस बार विफल हुए तो फिर उनमें कितनी राजनीतिक और सामाजिक शक्ति बनी रहेगी? असली विचारण के प्रश्न यही हैं। जिनके उत्तर खोजने की जरूरत है। 
        मैदान वही है, यानी रामलीला का मैदान। अन्ना वही हैं यानी इस बार भी आकर्षण का केन्द्र और आंदोलन-अभियान का नेतृत्व करने वाले भी अन्ना हैं। प्रश्न वही है यानी लोकपाल। मंच उसी तरह से सजाये गये हैं, राजनीतिक भभकियों की भाषा भी वही है। पर बदला क्या है? बदला यह है कि उनके इस आंदोलन और अभियान में न तो भीड है और न ही जनाक्रोश है। उपस्थित लोगों के चेहरे और हाव-भाव को देख कर लगता है कि अन्ना के साथ खडे लोग थके-हारे हैं, उनके बीच में परिवर्तन की कोई बडी इच्छा नहीं है, या फिर आंदोलन -अभियान के असफल होने का डर है जो उन्हें सता रहा है। किसानों की समस्याएं दूर करने के लिए अभियान और आंदोलन का नया विषय भी जोडा गया। नया विषय जोउने के पीछे तर्क यह था कि किसानों की भीड इस नाम से जुड जायेगी। अन्ना को यह समझाया गया था कि नरेन्द्र मोदी के राज में किसानों की स्थिति दयनीय हुई है, किसानों की आत्महत्याएं जारी है, किसान अपनी फसलों का उचित दाम हासिल नहीं कर पा रहे हैं। सही भी यही है कि देश में सबसे ज्यादा दमित, उत्पीडित और शोषित किसान ही है। खासकर महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के किसान अपने फसलो में आग लगाने, दूध, आलू और टमाटर सडकों पर फेकने जैसे कार्य कर नरेन्द्र मोदी को किसान विरोधी साबित करने की कोई कसर नही छोडी है। नरेन्द मोदी सरकार भी किसानों के प्रश्न पर विफल साबित हुई है। इसलिए निश्चित तौर पर किसानों कें अंदर नाराजगी है, अंसतोष है। खासकर महाराष्ट्र, गुंजरात, मध्य प्रदेश और दक्षिण के राज्यों में किसानों के कई बडे नेता स्थापित हुए हैं और उनकी पहचान नरेन्द्र मोदी विरोधी के तौर पर हुई हैं। अगर महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश के किसानों का समर्थन मिल जाता और उनकी अन्ना के इस आंदोलन-अभियान में सक्रिय भूमिका सामने आ जाती तो अन्ना एक बार फिर देश में राजनीति में जलजला लाने में सफल हो जाते, अन्ना के प्रताप और तेज से नरेन्द्र मोदी की सरकार जरूर झुलस जाती। पर अन्ना को खडा करने वाले एनजीओ और कांग्रेसी पृष्ठभूमि के लोग किसानों की सक्रियता क्यों नहीं सुनिश्चित कर पाये, यह चिंता और आत्मचिंतन की बात है।
अन्ना की वह शक्ति उनकी अपनी थी या फिर परायी थी? इस प्रश्न को जब इस आंदोलन और अभियान की कसौटी पर देखेंगे तो उत्तर आसानी से मिल जायेंगे। सच तो यह है कि अन्ना स्वयं के बल पर खडा नहीं होते हैं, वे स्वयं के बल पर आंदोलनकारी नहीं होते हैं, वे स्वयं के बल पर अभियानी नहीं होते हैं, वे स्वयं के बल पर सक्रिय नहीं होते हैं, वे स्वयं के बल पर राजनीतिक जलजला लाने के लिए सक्रिय नहीं होते हैं, वे स्वयं के बल पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लडने के लिए खडा नहीं होते हैं, वे स्वयं के बल पर राजनीतिक चिंतन नहीं करते हैं, वे स्वयं के बल पर समस्या समाधान की चिंता नही करते। फिर किसके बल पर करते हैं? सबसे बडी बात यह है कि अन्ना कोई महात्मा गांधी की तरह समाज सुधारक या फिर महामानव नहीं हैं जो अपनी जिदंगी को प्रयोगों में झोक दिये थे और उनके चिंतन और प्रयोगों से देश की आजादी निकली थी, अन्ना कोई भगत सिंह नहीं है जो शहीद होकर युवाओं के प्रेरणास्रोत बन गये थे, अन्ना हजारे कोई नेताजी सुभाषचन्द्र बोस नहीं हैं जो आजाद हिंद फौज की स्थापना कर उपनिवेशिक शक्ति को उखाड फेकने की शपथ लेकर भारतीयों के दिलों में आज भी राज करते हैं। अन्ना हजारे को हम अगर परजीवी कहें तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी, जिस प्रकार से एक ईएलएमआईएनटीएचएस नामक जीव परजीवी होता है उसी प्रकार से अन्ना भी परजीवी आंदोलनकारी और परजीवी अभियानी है। अन्ना स्वयं संघर्ष नहीं करते हैं, उनका संगठन भी चि_ी-पत्री तक ही सीमित हैं। उन्हें खडा करने के लिए मोहरे संगठन होते हैं, मोहरे संगठन के अन्ना मोहरे बन जाते हैं। अदृश्य होकर अदृश्य शक्तियां अन्ना के आंदोलन और अभियान में जान डालती हैं, भीड जुटाती हैं और आक्रोश को जन्म देती हैं, जिस पर सवार होकर अन्ना सरकार को ललकारते हैं। पिछली बार अदृश्य नामक शक्तियां भाजाप और संघ सहित कई हिन्दूवादी संगठन से निकली थी। भाजपा, संघ और हिन्दूवादी शक्तियां कांग्रेस के मुस्लिमकरण से परेशान थी, ये अदृश्य शक्तियां अदृश्य तौर पर अन्ना के लिए काम करती थी, भीड जुटाती थी और मीडिया का प्रबंधन करती थी। खासकर भाजपा सत्ता हासिल करने के लिए अन्ना को एक मोहरा के तौर पर देखती थी। उस आंदोलन और अभियान की सफलता के पीछे भी एक अन्य कहानी थी कि कांग्रेस के लोग अहंकारी हो गये थे, काग्रेस के राज में भष्टाचार की एक पर एक कहानियां देशवासियों को कचोट रही थी, आंदोलित कर रही थी, अभियानी बना रही थी।  कौन नही जानता कि लोकपाल का चिंतन परायी है। यह लोकपान का चिंतन अन्ना का अपना नहीं है। यह लोकपाल का चिंतन अरविन्द केजरीवाल आदि समूह का था। लोकपाल बनाने के लिए एक समूह की चिंता थी। उसी समूह ने अन्ना को जोडा था। आंदोलन की बागडौर अन्ना का सौंपा गया था। अब अरविन्द केजरीवाल ने विश्वासघात कर सत्ता हासिल कर लीं। अन्ना अब केजरीवाल से दूरी बना लिये हैं। अब दोनो अलग-अलग है। इसलिए उस समय की प्रत्यक्ष शक्तियां भी अब उनके साथ नहीं है। अरविन्द केजरीवाल ने जिस प्रकार से निराश किया है, राजनीतिक पार्टियों की पुरानी परमपरा का जिस प्रकार से अरविन्द्र केजरीवाल सहचर हो गये हैं, उससे लोकपाल आंदोलन से जुडे लोगों को विश्वास समाप्त हुआ है। आज युवा अन्य किसी में विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। यानी कि उन्हें समझ है कि सब एक जैसे निकल जायेंगे। नरेन्द्र मोदी की विफलता बहुत बडी है, जनाकांक्षा को वे भी स्वर नही दे पाये, जनाकांक्षा भी नरेन्द्र मोदी की छवि को तोडी है पर यह भी सही है कि नरेन्द मोदी की सत्ता कांग्रेस की सभी सत्ता प्रकल्पों से बेहतर है। भ्रष्टाचार की वैसी नाली नहीं बनी है जैसी गंदी नाली कांग्रेस की सत्ता में बनी थी। कहने का अर्थ यह है कि नरेन्द्र मोदी की विश्वसनीयता अभी भी जारी है। अन्ना के इस आंदोलन में जनाकांक्षा की सक्रियता कम होने और भीड न जुटने के कारण यही है। पर नरेन्द्र मोदी लोकपाल के गठन पर बईमानी कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी और उनका दल मजबूत लोकपाल की हिमायती रहे हैं। अब सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अभी तक लोकपाल के गठन में कोई मजबूत इच्छाशक्ति नहीं दिखायी है। मजबूत और सबककारी लोकपाल का बनना जरूरी है। 

लोकपाल के प्रश्न पर देश एकमत है, इसमें कोई दो राय नहीं है। अन्ना अगर परजीवी नहीं होते तो फिर इस बार का उनका आंदोलन और अभियान मोदी सरकार के लिए अतिम कील साबित होते।

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