कर्नाटक  विधानसभा चुनाव की दिनांक चुनाव आयोग ने घोषित कर दी है। चुनावी रणभेरी बज गई है। कर्नाटक चुनाव कांग्रेस और भाजपा, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों ही पार्टियों का बहुत कुछ दांव पर लगा है। भाजपा से अधिक चुनौती कांग्रेस के सामने है। कर्नाटक की विजय भाजपा के लिए इतनी ही महत्वपूर्ण है कि दक्षिण में कमल खिल जाएगा, जिसका लाभ उसे आगामी चुनावों में मिलेगा। उत्तरप्रदेश उपचुनाव में मिली पराजय का गम कुछ कम होगा। कार्यकर्ताओं में और अधिक उत्साह आएगा। २०१९ से पहले एक और राज्य से कांग्रेस की विदाई होने का लाभ भी भाजपा को मिलेगा। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी ने अपनी छवि लगातार जीतने वाली पार्टी की बना रखी है। बीच-बीच में कुछ अहम चुनावों में करारी हार भी इसे मिली है, पर पार्टी नेतृत्व की कुशलता कहिए कि हार भूलकर लोगों को सिर्फ उसकी जीत याद रहती है। उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों में मिली जीत ने इसे खुद को विश्वविजयी सिद्ध करने का अवसर उपलबध कराया, मगर उत्तरप्रदेश की दो अहम लोकसभा सीटों के उपचुनाव में मिली हार ने भाजपा को हिला दिया है। ऐसे में कर्नाटक में विजय भाजपा के लिए अत्यंत महत्व की सिद्ध होगी। वह किसी भी तरह इस चुनाव को हल्के में नहीं लेना चाहेगी। क्योंकि, इस जीत से राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को ताकत मिलेगी। वहीं, भाजपा की तुलना में कांग्रेस का बहुत कुछ दांव पर लगा है। पंजाब को छोड़ दें तो अभी यह देश का इकलौता बड़ा राज्य है जहां कांग्रेस की सरकार बची हुई है। अगर यह किला भी उसके हाथ से निकल गया तो नेतृत्व के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। कर्नाटक की विजय से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में एक आत्मविश्वास जागेगा और हार से हताशा। कांग्रेस को अपना खोया हुआ आत्मविश्वास प्राप्त करना है तो कर्नाटक चुनाव उसके लिए एक अवसर है। यदि यहाँ हारे तो आगे की राह बहुत कठिन है। कर्नाटक कांग्रेस के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इस बात को समझने के लिए यह पर्याप्त है कि यहाँ भी पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदिर यात्रा प्रारंभ कर दी है। हालाँकि यह बात अलग है कि लोग अब भी कांग्रेस को हिंदू विरोधी पार्टी के तौर पर ही देख रहे हैं। राहुल गांधी की मंदिर दौड़ लोगों के मन में बसी तस्वीर को बदल नहीं पा रही है। कांग्रेस की कर्नाटक सरकार का लिंगायत समुदाय को नया धर्म बनाने का निर्णय हिंदुओं को बाँटने की श्रेणी में आता है। टीपू सुल्तान की जयंती जोर-शोर से आयोजित करके भी कांग्रेस तुष्टीकरण की नीति को ही आगे बढ़ाती दिखती है। बहरहाल, कर्नाटक को जीतने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपना पूरा जोर लगा रहे हैं। देखना होगा कि कर्नाटक की जनता किसके साथ जाती है। जिस तरह से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मेहनत कर रहे हैं, कर्नाटक में जाकर वहाँ के लोगों से संवाद कर रहे हैं, उसे देखकर भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई देता है। भाजपा को उम्मीद है कि विजय उसकी ही झोली में आएगी। बाकि, परिणाम के लिए 15 मई का इंतजार सबको है। 

विदेश