किसी समय बंगाल आजादी के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों का केन्द्र रहा, खुदीराम बोस जैसे बालकों ने भी अपना बलिदान दिया। सुभाष बोस के तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा के प्रेरक नारे ने आजादी के लिए संघर्ष के लिए लोगों को प्रेरित किया। आजादी के साथ इसी बंग भूमि का रक्त रंजित विभाजन हुआ। बंग भूमि पर साढ़े तीन दशक तक माक्र्सवादी विचारों की सत्ता रही, लेकिन लोगों को जब आभास हुआ कि माक्र्सवादी उग्रवाद माँ काली के श्रद्धा भाव को प्रभावित करता है, धर्म संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को नष्ट कर माक्र्स लेनिन के विचारों को थोप रहा है तो पं. बंगाल के लोगों ने एक झटके में माक्र्सवादी शासन को उखाड़ फेंका और विद्रोह की राजनीति करने वाली ममता बेनर्जी को सत्ता सौंप दी। यदि जनता के मर्म, जिससे भारत की धड़कन चलती है उस पर चोट की तो वह न केवल पं. बंगाल की वरन पूरे भारत की जनता बर्दाश्त नहीं कर सकती। शक्ति का देवी माँ काली की उपासक बंगाली जनता धर्म विरोधी राजनीति को बर्दाश्त नहीं कर सकती। जब देवी के विसर्जन की परम्परा में अवरोध पैदा किया जाता है। राम नवमी के जुलूस पर रोक लगाई जाती है तो इसक प्रखर प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है, जब ममता बेनर्जी तुष्टीकरण के द्वारा मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए हिन्दुओं को प्रताडि़त करने के साथ धार्मिक परम्परा में अवरोध पैदा करती है, उसके लिए नव उत्तेजना का माहौल बना। हिन्दू एकजुटता के साथ ममता बेनर्जी के शासन के खिलाफ खड़ा हो गया, रामनवमी पर हथियारों के साथ जुलूस निकले। हालत यह हुई कपटी सेक्यूलर नेतृत्व को यह समझ में आया कि उनकी सत्ता तभी तक सुरक्षित रह सकती है जब हिन्दुओं को यह आभास कराया जाय कि वे भी हिन्दुत्व के समर्थक है। इसलिए ममता बेनर्जी ने पहली बार रामनवमी पर जुलूस सरकार स्तर पर निकालने के निर्देश दिये। हिन्दू भावना के साथ कौन खड़ा है, इसकी स्पर्धा इस रामनवमी पर पं. बंगाल में दिखाई दी। पं. बंगाल की राजनीति में अब माँ काली और श्रीराम के भाव केन्द्र में है। धर्म, संस्कृति, परम्परा का प्रवाह भारत में सदियों से प्रवाहित है। हिन्दुत्व में ही भारत की आत्मा के दर्शन होते है। हिन्दुत्व से प्रेरित राजनीति ही भारत को महानता के शिखर ले जा सकी है। पं. बंगाल में चाहे ममता बेनर्जी का शासन हो लेकिन वहां चारो ओर भगवा पताका फहरा रही है, रामनवमी और माँ काली पूजा से पहले से अधिक उत्साह के साथ जन सैलाब उमड़ रहा है। अब पं. बंगाल में भी राजनैतिक क्रांतिकारी बदलाव की आहट के संकेत मिल रहे है। जिस तरह रामकथा में कहा गया है कि जब राक्षस राज रावण और उसके राक्षस श्रीराम के रामबाण के डर से न ऋषि मुनियों के आश्रमों को नष्ट कर पा रहे थे और न श्रीराम के राक्षस विरोधी अभियान को रोक पा रहे थे, तब रावण ने कपटी नीति का सहारा लिया। कालनेमी राक्षस ने साधु के छद्म वेष में महावीर हनुमान को रोकने की कोशिश की। मारीच ने स्वर्ण मृग के छदम वेष में श्रीराम को भ्रमित करना चाहा और रावण साधु के छदम वेष में सीताजी का अपहरण करने में सफल हो गया। धर्म संस्कृति के प्रतीक साधु संतों के प्रति लोगों में विश्वास था इसलिए रावण ने कपट नीति से श्रीराम को हाििन पहुंचाने की कोशिश की। राक्षस कपटी मापा को जानते थे। यही स्थिति आज भी है जनता को भ्रमित करने के लिए कपट नीति अपनाई जाती है। कांग्रेस के पतन की इबारत  राहुल गांधी लिख रहे है। उन्हें लगा कि जनता धार्मिक भावना से प्रभावित होती है शायद उन्हें यह भ्रम है कि हिन्दू भावना को उभारकर भाजपा ने बहुसंख्य हिन्दुओं को अपने पक्ष में कर लिया। इसलिए उन्होंने भी जनेऊधारी हिन्दू होने का दिखावा गुजरात चुनाव में किया। मंदिरों में जाकर मूर्ति और पूजारियों केो धोक दिया। इस प्रकार राहुल ने भी कट्टर शिवभक्त होने का दिखावा किया। उनकी छदम हिन्दू पहचान का प्रभाव कितना हुआ, यह विस्तार से चर्चा का विषय हो सकता है। अब कर्नाटक में भी राहुल मंदिरों में जा रहे है जनेऊधारी से तिलकधारी हिन्दू की प्रतिछाया उनके छद्म हिन्दू वेष में दिखाई दे रही है। मंदिर मठो के श्रद्धाभाव को भुनाने में राहुल जुटे हुए है। ऐसा लगता है कि राजनीति में भी असली और नकली हिन्दुत्व आमने-सामने है। चाहे शब्दों के हेरफेर से इस स्थिति का अध्ययन भिन्न दृष्टि से किया जाय, लेकिन भारत की राजनीति का आधार धर्म के अलावा कुछ नहीं हो सकता। जिस आधार पर समाज रचना है, जिससे जनजीवन संचालित होता है, उस धर्म से अलग हटकर कोई विचार भारत का जनमन स्वीकार नहीं कर सकता। धर्मविहीन बंजर भूमि पर राजनैतिक फसल पैदा करने की कई बार कोशिश की गई, लेकिन ऐसी फसल के बीज भी नष्ट हो गये। आज कहां है, माक्र्सवादी, माओवादी विचार? उनके एक के बाद एक गढ़ ध्वस्त हो गयेे। पं. बंगाल गया, अब त्रिपुरा में भी धराशाही हो गये। केरल में शेष है, उस ओर भी राष्ट्रवादी प्रवाह तेजी से बढ़ रहा है। कम्युनिस्ट मुक्त भारत के खंडहरों से यह आवाज उठने लगी है कि हम भी कुछ थे। राजनैतिक पंडित सेक्यूलर शब्द को परिभाषित करने की माथा पच्ची करते रहते है। हिन्दुत्व अवधारणा में ही सर्वधर्म समभाव है। जिस हिन्दू का चरित्र ही इस भाव का रहा है, उसे किसी आयातीत शब्द सेक्ूयलर की  घुट्टी पिलाने की आवश्यकता नहीं है। सेक्यूलरी का ढिंडोरा वे पीटते है, जो भारत की भाव भूमि चा चरित्र को नहीं जानते। जिस भारत में बर्बर जातियों, हमलावरों और हिन्दू विरोधियों को भी आत्मसात किया। यदि कोई हिन्दू को सेक्यूलर पाठ पढ़ाता है तो यही कहा जायेगा प्राइमरी टीचर किसी विश्वविद्यालय के कुलपति को समझा रहा है। भारत की राजनीति में सेक्यूलर प्रजाती पैदा हुई। यह प्रजाति ऐेसी है जिसे ग से गणेश समझ में नहीं आता लेकिन ग से गधा कहा तो समझ में तुरंत आ जाता है। सेक्यूलर प्रदूषन के कारण ही हिन्दू देवी देवता, रामकृष्ण यहां तक हिन्दुओं के प्रतीकों को भी साम्प्रदायिकता की श्रेणी में खड़ा कर दिया। गौरवशाली इतिहास में भी साम्प्रदायिकता दिखाई दी, महापुरूषों की विजय गाथा को पराजय गाथा से परिवर्तित कर इतिहास के साथ खिलवाड़ किया गया। जिस तरह हिन्दू विरोधी हमलावरों और अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म संस्कृति पर प्रहार किया। उसी नीति के पर्याय की तरह सेक्यूलर नेतृत्व ने गत साठ-पैसठ वर्षो तक हिन्दू भावना को आहत कर अपने राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति की। इस हिन्दू विरोधी सेक्यूलर राजनीति और नेतृत्व के खिलाफ भारत का जनमन अब ऐसी पाखंडी सेक्यूलर नीति और नेतृत्व के जाल से मुक्त होना चाहता है। इसे कांग्रेस मुक्त भारत कहा जाय और या अन्य शब्द की पहचान दी जाय। लेकिन सच्चाई यह है कि अब धर्म संस्कृति परम्परा के विरोध की राजनीति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह सवाल चिन्तन का हो सकता है कि साठ दशक तक ऐसी हिन्दू विरोधी नीति को भारत की बहुसंख्य जनता का समर्थन क्यो मिला, क्यों सत्ता पर काबिज होकर खुला खेलने का अवसर दिया। इसकी सच्चाई यह है कि हिन्दू बंटा हुआ था, संगठन शक्ति नहीं होने से उसकी आवाज या विरोध को दबा दिया जाता था, अब स्थिति में बदलाव हुआ। हिन्दू की एकजुट आवाज से सेक्यूलर नेतृत्व घबरा रहा है। हिन्दुओं की भावना के अनुरूप राजनीति को स्वरूप देने वाला सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विकल्प और नरेन्द्र मोदी के प्रभावी और सक्षम नेतृत्व के साथ भारत की जनता खड़ी हो गई है। इस युगान्तरी बदलाव से देश में क्रांतिकारी ऊर्जा का प्रकटीकरण हो रहा है। इस बदलाव के साथ वे भी जुड़ रहे है जो सेक्यूलर नेतृत्व के साथ है। इस विचार प्रवाह और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को रोकने के लिए चाहे राजनैतिक जंगल के सियार, लोमड़ी, भेडिय़ा आदि मिलकर घेरने की कोशिश करे, लेकिन शेर का सब मिलकर भी सामना नहीं कर सकते। नरेन्द्र मोदी के साथ प्रबल संगठन है, संस्कृति आधारित नीति की स्पष्ट दृष्टि है। कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल की बुद्धि का स्तर तो यह है कि वे एनसीसी के बारे में नहीं जानते। रामनवमी पर मन की बात में रामराज्य की अवधारणा के अनुरूप भारत को महान बनाने का विचार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रस्तुत किया। राम मय राजनीति ही भारत की शक्ति समृद्धि के विकास की दृष्टि है। 
(लेखक - वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

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