उत्तरप्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में जीत प्राप्त करने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में हुए बेमेल गठबंधन को राज्यसभा के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। गोरखपुर और फूलपुर के लिए उपचुनाव में यह गठबंधन अचानक हुआ था। विजयी ध्वजा लेकर निकली भारतीय जनता पार्टी को यह अंदाजा कतई नहीं था कि धुर विरोधी सपा-बसपा एक हो जाएंगी। इसलिए उस समय भाजपा अपनी रणनीति नहीं बना सकी और उसे गोरखपुर में बड़ी हार का सामना करना पड़ा। किंतु, इस बार भाजपा ने पहले से ज्ञात इस गठबंधन की चुनौती को गंभीरता से लिया और राज्यसभा के लिए महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की। एक ओर यह जीत भाजपा के भीतर उत्साह को बढ़ाएगी, वहीं दूसरी ओर सपा-बसपा के बीच कहीं न कहीं एक दरार डालने का काम करेगी। भले ही हार का घूंट पीकर बसपा प्रमुख मायावती ने कह दिया हो कि यह गठबंधन जारी रहेगा। लेकिन, इस पराजय से कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया है कि सपा ने बसपा के साथ विश्वासघात किया है। इसलिए बसपा प्रमुख के कहने का कितना असर बसपा कार्यकर्ता का मन बदल पाएगा, यह भविष्य ही बताएगा। राज्यसभा के चुनाव में सबकुछ पहले से ही तय रहता है कि किस पार्टी के हिस्से कितनी सीट आएंगी। बसपा को पता था कि वह दस में से एक भी सीट अपने बूते नहीं जीत सकती। इसलिए उसने अपने नये-नवेले साथी सपा के सहयोग और कांग्रेस एवं रालोद विधायकों के भरोसे अपना प्रत्याशी मैदान में उतारा था। भाजपा की आठ और सपा की एक सीट पक्की थी। 10वीं सीट के लिए ही समूची उठा-पटक थी। मतदान के दिन बसपा के उम्मीदवार जरूरी ३७ वोट नहीं जुटा सके। क्योंकि, सपा के विधायकों ने बसपा का साथ नहीं दिया। राजनीतिक गलियारों के भीतरखाने से इस परिणाम के संकेत आ रहे हैं। कई प्रकार की चर्चा भी प्रारंभ हो गई है। बसपा प्रत्याशी की हार के बाद क्या सपा-बसपा के संभावित गठबंधन पर विराम लग जाएगा? सवाल यह भी है कि सपा बसपा को गोरखपुर एवं फूलपुर का रिटर्न गिफ्ट देने में नाकाम क्यों रही? क्या बसपा इस हार के बाद नये दोस्तों को तलाशेगी? क्या बसपा समर्थन या गठबंधन की बजाय अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरेगी? क्या निकट समय में कैराना लोकसभा उपचुनाव में गोरखपुर और फूलपुर वाली दोस्ती नजर आएगी? बसपा प्रमुख मायावती के वक्तव्य के बाद भी यह चर्चाएं बंद नहीं हुई हैं। मायावती ने यह दावा जरूर किया है कि वह गठबंधन को टूटने नहीं देंगी। किन्तु, साथ में उन्होंने यह भी प्रमुखता से उल्लेख किया कि अखिलेश यादव राजनीति में कम अनुभवी हैं। उन (मायावती) के पास राजनीतिक अनुभव अधिक है। इसलिए यदि वह अखिलेश की जगह होतीं तो बसपा का प्रत्याशी हार नहीं पाता। जैसा कि ऊपर संकेत किया है कि इस हार का संदेश बसपा के कार्यकर्ताओं में अच्छा नहीं गया है। उनका सोचना है कि सपा ने बसपा को जानबूझकर हराया है। इसी प्रकार मायावती के इस वक्तव्य का नकारात्मक प्रभाव समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर पड़ सकता है। कार्यकर्ता यह विचार कर सकते हैं कि मायावती उनके नेता अखिलेश यादव का हल्का आकलन कर रही हैं। कोई भी साधारण कार्यकर्ता यह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं होता कि उनके नेता को कमतर आंका जाए। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि राज्यसभा में एक सीट हारने पर यह गठबंधन खत्म होने लगेगा या फिर गठबंधन पर कोई असर नहीं आएगा। यह सब भविष्य के गर्भ में छिपा है। किंतु, इतना अवश्यक माना जा सकता है कि सपा-बसपा के गठबंधन को भाजपा ने जो जोर का झटका दिया है, उसका असर तो होगा।  

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