केंब्रिज एनालिटिक प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि डिजिटल युग में हमारी निजता की कोई गारंटी नहीं है। जो फेसबुक पिछले दिनों एक-एक पृष्ठ के विज्ञापन जारी कर सोशल मीडिया पर चलने वाले फर्जीवाडे के प्रति जाग्रत कर रहा था, वह स्वयं ही लोगों की सूचनाएं चोरी कर उन्हें बेचने के मामले में लिप्त है। 'विश्वसनीयता को चोट पहुँचाने वाले इस प्रकरणÓ ने सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों की नींद ही नहीं उड़ाई है, बल्कि सरकारों को भी हिला दिया है। राजनेताओं में बेचैनी बढ़ा दी है। सामने आ रहा है कि केंब्रिज एनालिटिक नाम की कंपनी ने फेसबुक के पांच करोड़ अमेरिकी उपयोगकर्ताओं की गोपनीय सूचनाएं चोरी कर उनका इस्तेमाल डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव जिताने में किया। इसी तरह 'ब्रेक्जिटÓ के वक्त ब्रिटेन ने भी इसका इस्तेमाल किया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि क्या यह फेसबुक उपयोगकर्ताओं के साथ छल नहीं है? उक्त बात सामने आने पर अमेरिका में वहां की संघीय व्यापार एजेंसी ने फेसबुक के खिलाफ जांच शुरू की। इसी तरह यूरोपीय देशों में भी जांच शुरू हुई। भारत सरकार ने भी फेसबुक को चेतावनी जारी की है। जिसका असर यह हुआ कि केंब्रिज एनालिटिक मामला सामने आने के बाद पांच दिन से शांत फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग बोलने के लिए मजबूर हुए और उन्होंने कहा कि भारत सहित अन्य देशों में होने वाले चुनाव से पूर्व वह यह सुनिश्चित करेंगे कि फेसबुक उपयोगकर्ताओं की जानकारी कोई चोरी न कर सके। जब यह बात सामने आई कि फेसबुक से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर चुनाव प्रभावित किए जा सकते हैं, तब से भारतीय राजनीति में भी भूचाल आया हुआ है। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वर्ष २०१९ में चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने केंब्रिज एनालिटिक की सेवाएं ली हैं। कांग्रेस फेसबुक से चोरी की गई लोगों की जानकारी के आधार पर चुनाव जीतने का प्रयास कर रही है। हालाँकि भाजपा के इस आरोप को कांग्रेस ने सिरे से खारिज किया है। कांग्रेस ने भी आरोप लगाया है कि भाजपा ने ही इस कंपनी की सेवाएं ली हैं। पारदर्शिता के इस समय में यह सच्चाई भी छिपी नहीं रहेगी कि वाकई किसने निजी सूचनाएं चोरी करने वाली कंपनी की सेवाएं ली हैं। बहरहाल, यह प्रश्न जरूर उठ रहा कि क्या हमारे राजनेता जनता से संवाद करने की जगह इस प्रकार सामाजिक धोखाधड़ी करके चुनाव जीतेंगे? अगर कपटपूर्ण तरीकों का इस्तेमाल कर चुनाव जीते जाते हैं तो इससे राजनीतिक व्यवस्था भी कठघरे में खड़ी होती है। इस समूची बहस के दौरान सबसे बड़ी चिंता सामान्य व्यक्ति की है, जिसने सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों को अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना लिया है। उसके सामने चुनौती सिर्फ फेसबुक नहीं है, बल्कि और भी सामाजिक माध्यम हैं। क्योंकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फेसबुक की तरह अन्य माध्यम भी लोगों की निजी जानकारी चोरी कर रहे होंगे। सामाजिक माध्यम निजता के लिए सबसे बड़े खतरे बन गए हैं। इंटरनेट के उपयोग में कम प्रशिक्षित व्यक्तियों को तो छोड़ ही देना चाहिए, यहाँ इंटरनेट के उपयोग में दक्ष व्यक्ति की निजता भी सुरक्षित नहीं है। इस प्रकरण के बाद देश-दुनिया में अब यह विमर्श प्रारंभ होना चाहिए कि इंटरनेट के उपयोग को पूरी तरह सुरक्षित कैसे बनाया जाए? क्योंकि इसका उपयोग बंद करना तो उचित नहीं होगा? क्योंकि जब जिस युग की तरफ बढ़ रहे हैं, वहाँ इंटरनेट आधारित माध्यमों के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि हम इंटरनेट को और अधिक सुरक्षित बनाएं। इंटरनेट आधारित धोखाधड़ी, निजी सूचनाओं की चोरी और उनके व्यावसायिक उपयोग को रोकने के लिए वैश्विक कानून बनाए जाएं। 

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