कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि अब भी उसकी नीति 'बांटो और राज करोÓ ही है। राज्य के लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को अलग धर्म के रूप में मान्यता देना, हिंदू समाज को बांटने का ही कार्य है। कर्नाटक सरकार ने स्पष्टतौर पर विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने निर्णय लिया है। राज्य में विधानसभा चुनाव को अब दो माह का समय भी नहीं बचा है। कांग्रेस को राज्य में अपनी हालत का आकलन है। वह हार से भयभीत है। अपनी संभावित हार को 'सांप्रदायिक चालÓ से जीत में बदलने का उसने एक दांव खेला है। देखना होगा कि उसका यह दांव कितना काम आता है। क्योंकि, राज्य में लिंगायत समुदाय के भीतर से ही कांग्रेस सरकार के इस निर्णय का विरोध प्रारंभ हो गया है। कांग्रेस के ही कई नेता सत्ता के लिए समाज को इस प्रकार बांटने की नीति के विरुद्ध हैं। वीरशैवों के संत और बलेहोनुर स्थित रंभापुरी पीठ के श्री वीर सोमेश्वर शिवाचार्य स्वामी ने तो इस फैसले को साजिश करार देते हुए कानूनी विकल्प पर विचार करने की धमकी दे डाली है। लिंगायत समुदाय कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए महत्व रखता है। राज्य की कुल जनसंख्या में इसकी भागीदारी १८ प्रतिशत के आसपास है। कांग्रेस लिंगायतों को अपना पुराना वोट बैंक मानती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से आते हैं। समुदाय में उनकी गहरी पैठ है। लिंगायतों को अलग धार्मिक समुदाय मानने के मुद्दे पर राजनीति पुरानी है। अलग धार्मिक दर्जे की मांग को लेकर लिंगायत कई बार प्रदर्शन भी कर चुके हैं। किंतु, अब तक उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया गया था। यहां तक कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते, लिंगायतों के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि यह फैसला हिंदुओं को बांटने वाला होगा और इससे समुदाय की अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित आरक्षण भी खत्म हो जाएगा। अब यहां स्वाभाविक ही यह प्रश्न उठता है कि जिस कांग्रेस के प्रधानमंत्री ने हिंदू और देश हित में लिंगायतों को अलग धार्मिक दर्जा देने से इनकार कर दिया था, उसी कांग्रेस के सामने अब कौन-सी मजबूरी आ गई? देश की जनता को स्पष्टतौर पर समझ आ रहा है कि कांग्रेस ने अब तक अपनी पराजयों से सबक नहीं लिया है और अब भी कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक हथियार से ही चुनावी लड़ाई लडऩे की कोशिश कर रही है। यह भी कि स्पष्ट दिख रहा है कि कांग्रेस सांप्रदायिक और धर्म की राजनीति करने का आरोप भाजपा पर लगाती है, किंतु इस प्रकार की राजनीति से वह भी दूर नहीं है। वोटबैंक की राजनीति करने में उससे अधिक चतुर और कोई पार्टी दिखाई नहीं देती है। देश की राजनीति में 'वोटबैंकÓ और 'तुष्टीकरणÓ की शब्दावली एवं अवधारणा कांग्रेस की राजनीतिक नीति की ही देन है। कर्नाटक में भी वह यही कर रही है। चुनाव में जाति-धर्म जैसे मुद्दे सिर्फ लोगों को बांटने और द्वेष पैदा करने का काम करते हैं। बेहतर हो कि विकास, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे बनें। देश में जब विकास को राजनीति का केंद्र बनाने का प्रयास हो रहा है, तब क्या यह आवश्यक नहीं कि कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियां इन्हीं मुद्दों पर विमर्श करें? 

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