गोरखपुर  लोकसभा उपचुनाव के परिणाम ने देश की राजनीति में भूकंप मचा दिया है। जहां भारतीय जनता पार्टी हक्का-बक्का हो गई है, वही उसकी विरोधी पार्टियां आह्लादित है। क्योंकि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने का मंत्र मिल गया है। इस परिणाम से उत्साहित और स्तब्ध रह जाने वालों में केवल स्वदेशी राजनीतिक दल और विश्लेषणकारी शामिल नहीं है विदेशों में इसकी समीक्षा की जा रही है। गोरक्षपीठ के अधीश्वर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके स्वर्गीय गुरु अवैधनाथ जिस क्षेत्र से 1989 से बराबर विजयी होते रहे हैं, जो क्षेत्र जाति पात की आंधी में भी हिन्दुत्व एकता का अविजित किला बनकर खड़ा रहा वहां उसकी पराजय कैसे हो गई? इसके कारणों की पार्टी जो भी समीक्षा करे लेकिन एक बात बहुत स्पष्ट है कि निरंतर विजय यात्रा में बढ़ते हुए यदि धरातल की उबड़ खाबड़ स्थिति संज्ञान नहीं रहता है तो दुर्घटना हो ही जाती है। इस चुनाव परिणाम का वही असर होगा जो 1969 में प्रदेश की मुख्यमंत्री टीएन सिंह की इस निर्वाचन से मंत्री मानीराम विधानसभाई उपचुनाव में हार के बाद इंदिरागांधी के वरचस्व की वृद्धि के रूप में सामने आया था, या फिर जिस प्रकार इसी वर्ष गुजरात विधानसभा चुनाव में हार के संभावना पर गैर भाजपा ने पचास प्रतिशत मत प्राप्त कर पुन: सत्ता संभाली थी, उसी प्रकार की सजगता आयेगी, यह तय करेगा कर्नाटक विधानसभा का दो महीने के भीतर होने वाले चुनाव में जहां कांग्रेस अपना अंकित किला ध्वस्त होने से बचाने में और भाजपा उसे ध्वस्त कर कांग्रेसयुक्त भारत बनाने के संकल्प के साथ मैदान में उतर गई है। गोरखपुर उपचुनाव के परिणाम को किसी भी उपचुनाव के परिणाम के समान नहीं देखा जा सकता। मुख्यमंत्री के अतिरिक्त भी योगी आदित्यनाथ का उस क्षेत्र में महत्व है। सन्यासी बनने और मठ में आने के बाद से उन्होंने शिक्षा और समाज सेवा के माध्यम से क्षेत्र के प्रत्येक मतदाता से तदात्म्य स्थपित किया था, उनका अपना एक तंत्र है जो प्रशासन तंत्र से भी अधिक चुस्त और दुरूस्त है। फिर भी हार क्यों हुई और क्यों गोरखपुर में परिणाम के बाद यह चर्चा हो रही है कि यह योगी की नहीं भाजपा की हार है। उम्मीदवार के चयन से लेकर प्रचार अभियान और व्यवस्था आदि की चर्चाओं में किन्हीं बूथों पर पोलिंग एजेंट तक न हो तो यही स्पष्ट होता है कि जीत के अतिविश्वास से उत्पन्न निष्क्रयता इस पराजय का मुख्य कारण है। मोदी और योगी की छवि के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता लेकिन इस छवि के बावजूद चाहे लोकसभा का चुनाव हो, राज्यों विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों-उत्तर प्रदेश में भी-चुनाव के पूर्व जिस प्रकार सभी को जोडऩे का प्रयास हुआ उसकी सार्थकता का संज्ञान कम हो गया है तथा धरातल विहीन गणेश परिक्रम पराक्रमियों की घेराबंदी अधिक प्रभावी हो गई है। यही घेराबंदी राजनीतिक दलों को सत्ताच्युत करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गोरखपुर उपचुनाव परिणाम ने जहां दिग्विजय की दिशा में बढ़ रही भाजपा को हक्का बक्का कर दिया है वहीं उसका सहयेाग करने वालों को गुर्राने का अवसर भी प्रदान किया है। लेकिन इस परिणाम से सबसे ज्यादा उत्साहित वह कांग्रेस है जो राज्यों को गंवाते हुए, जमानत भी नहीं बचा रही है। विजयी समाजवादी पार्टी जहां मायावती के पोस्टर लगा रही है। भीमराव अम्बेडकर और डा. राम मनोहर लोहिया में समानता देखने लगी वहीं मायावती भविष्य के बारे में चुप हैं। मायावती के मौन का क्या अर्थ है। अर्थ साफ है यदि समाजवादी या अन्य कोई भी उन्हें ही नेता मानेगा तभी उसके साथ तालमेल या समझौता हो सकेगा। सबसे दुर्दशा में वामपंथी है जो बंगाल के बाद न केवल अपना सबसे सुरक्षित किला त्रिपुरा खो चुके हैं बल्कि जिस बंगाल पर उन्हेांने लगभग चौथाई सदी तक राज किया वहां से  राज्यसभा के लिए एक सदस्य भी चुनवाने की हैसियत में नहीं रह गये हैं। प्रत्येक क्षेत्रीय दल जिनके प्रभाव वाले राज्यों की संख्या काफी है और कुछ राष्ट्रीय कहे जाने वाले दल जो केवल किन्हीं राज्यों में ही सीमित है 2019 में सफलता के लिए गठबैठ करने में जुट गए हैं। तेलगू देशमक  चंद्रबाबू नायडू जहां वाईएसआरके जगमोहन रेड्डी की चुनौती से घबड़ाकर राजग का साथ अनावश्यक मुददे पर छोड़ बैठी है, वही बगल के तेलांगना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर गैर कांग्रेसी गैर भाजपाई मोर्चा की पहल में जुट गए हैं। शरद पवार की दुविधा महाराष्ट्र के कारण बनी हुई है, वे कांग्रेस के साथ जायें या तीसरे मोर्चे में। उधर त्रण मूल कांग्रेस ने कहा है कि मोदी का मुकाबला करने की क्षमता केवल ममता बनर्जी में है। कांग्रेस ने हाल में आयोजित अपने महासम्मेलन में राहुल गांधी को विधिवत अध्यक्ष चुनने के बाद उम्मीद जाहिर किया है कि सभी गैर भाजपाई दल एक मोर्चे में शामिल होंगे लेकिन कांग्रेस मोर्चे के नेता के रूप में किसी और को स्वीकार करने का संकेत नहीं दिया है। सभी यह अनुभव कर रहे हैं कि मोदी सरकार तो जा रही है, हमस ब मिलकर उसे अपदस्त कर सकते हैं, जैसा गोरखपुर में हुआ लेकिन नेतृत्व हमारा होना चाहिए। गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई मोर्चे का पिछले डेढ़ दशक में दर्जनभर हुए प्रयास का जो हश्र हुआ है वह हमारे सामने है। राजेशखर रेड्डी, ममता बनर्जी, शरद पवार, चन्द्रबाबू नायडू में कौन नेता बनेगा? एक क्षेत्रीय दल जो लंबे समय से अपने राज्य में प्रभावी है-बीजू जनता दल के नेता मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इन किसी प्रयासों में शामिल नहीं हैं। तामिलनाडू में जहां फिल्मी धुरंधर मैदान में आ गए हैं और अन्ना डीएमके कई क्षेत्रों में विभाजित है,  तथा मुख्य विरोधी दल द्रविड़ मुनेत्र कडग़म उत्तर भारत विरोधी अभियान को हिन्दी विरोध के बाद आंध्र तेलांगना, कर्नाटका, केरल और तामिलनाडू को वृहद द्रविड़स्तान बनाने के नारे पर उतर आ गई है, यह कहना कठिन है कि कोन 2019 के चुनाव में विचार करवट लेगा। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने गोरखपुर उपचुनाव मे परिणाम की तुलना 1998 में ग्वालियन में आयोजित तीन देशों के बीच क्रिकेट श्रंखला के मैच से भी कर रहे हैं जिसमें केन्या ने भारत को 59 रन से हरा दिया था। उसके बाद केन्या का नाम क्रिकेट जगत में गुम हो गया और भारत ऊपर जाते हुए शिखर पर पहुंच गया। मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की नौटंकी का पटक्षेप वैसे तो गैर भाजपाई दलों की चाहे समर्थक हों या विरोधी-पोल खोल दिया है। साथ ही देष में अराजकता की माहौल बढ़ाने के लिए वे किसी भी कल्पित मुद्दे का सहमत ले सकते हैं इसका भी संकेत दे दिया है। यह भी स्पष्ट हो गया है कि भेदी किसी भी ब्लैकमेल के सामने झुकने वाले नहीं हैं। कुछ समीक्षकों ने 2019 के निर्वाचन को भाजपा बनाम खिचड़ी निर्वाचन की संज्ञा प्रदान करते हुए यह प्रश्न उपस्थित किया है कि क्या देश तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था और मानचित्र पर उभरते स्वरूप के मुकाबले जाति, क्षेत्र, संप्रदाय में विभक्त रहकर अलग-अलग दिशाओं के और मुंह बाये खड़े स्थानिक से अधिक व्यक्तिगत प्राथमिकता  के आधार पर संभावित एकजुटता की खिचड़ी को पकने देंगे, जो अब तक उन केवल स्थायी साबित उन्हें है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती और राजनीतिक स्थिरता के लिए चुनौती साबित हुई है। लोकहित के व्यापक दृष्टिकोण की जिस भावना ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया था, क्या वह लुप्त हो या सुप्त हो रहा है और अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल की भूरि भूरि प्रशंसा करने वाला देश शाइनिंग इंडिया को नजरंदाज कर एक ऐसी शासन व्यवस्था के दौर में चला गया है जो व्यक्तिगत स्वेच्छाचारित और प्रशंसा का पर्याय बन गया था। क्या वही हश्र राइजिंग इंडिया का भी होगा? शाइनिंग इंडिया के बावजूद वाजपेयी सरकार की पराजय का कारण बना विपक्ष की अति अविश्वसनीयता की भावना से उत्पन्न मनोदशा जिसने धरातलीय स्तर पर नीतियों के अमल का संज्ञान नहीं लिया। भाजपा यदि इनत थ्यों का संज्ञान लेकर अपना समालोचन कर आचरण करती है तो उसके नेतृत्व के प्रति देश में व्यापत विश्वास पर कोई भी खिचड़ी गठबंधन प्रभावकारी नहीं हो सकता। क्योंकि मोदी के समान किसी नेता की साख नहीं है। वाजपेयी की साख के समान भी कोई साख वाला नेता नहीं था। लेकिन उस समय शाइनिंग इंडिया का प्रभाव नहीं बन पाया था। राइजिंग इंडिया उस प्रकार का प्रभावहीन नहीं होने देगी। भाजपा के सामने विपक्षी दलों की हलचल से अधिक बड़ी चुनौती है देश में जागरूकता को पुष्ट बनाए रखना।

                                                                                                                                                                         राजनाथ सिंह 'सूर्यÓ

विदेश