भोपाल
नगर निगम ने भानपुर खंती में दबे कचरे से बनी मीथेन गैस को निकालकर खुले आसमान में छोडऩे का कार्य सौंपा है। यह कार्य अच्छा तो है ताकि खंती में आग न लग सके। परन्तु पर्यावरण की दृष्टि से ही नहीं मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक माना जाने लगा है। बताया जाता है कि नगर निगम ने सूरत की सौराष्ट्र एनवायरो प्राइवेट लिमिटेड को खंती के कचरे का साइंटिफिक क्लोजर का दायित्व सौंपा है। दोबारा आग लगने की घटना को रोकने के लिए कंपनी ने हाल ही में खंती में एक दर्जन स्थानों पर बैंड पाइप लगाए हैं। जिससे कचरे के नीचे दबी मीथेन सहित अन्य गैसें निकल रही हैं। बताया जाता है कि अगर मीथेन गैस की पर्यावरण में अधिकता हो गई तो यह मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

मीथेन गैस खुले में छोडऩा गलत
जानकारों के अनुसार मीथेन के साथ कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा रहती है। इसकी अधिकता से जलवायु परिवर्तन का खतरा है। वहीं दमा के मरीजों को अटैक भी आ सकता है। सांस लेने में मुश्किल हो सकती है। यह भी मानना है कि मीथेन गैस को खुले में छोडऩा अवैज्ञानिक तरीका है। वायुमंडल में इस गैस की अधिकता से सांस संबंधी बीमारी होगी। हैरानी की बात तो ये है कि निगम एक ओर कचरे से मीथेन और बिजली बना रहा है। दूसरी तरफ गैस खुले में छोडऩा समझ से परे है। यह भी मानना है कि खंती में मीथेन गैस सहित कई जहरीली गैसों का भंडार है। ऐसे में लगातार गैस को खुले में छोडऩे से जलवायु परिवर्तन हो सकता है। कार्बन डाईऑक्साइड तो पौधों में अवशोषित हो जाएगी। लेकिन मीथेन गैस पर्यावरण में बनी रहेगी। जो मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा है।

पर्यावरण के साथ स्वास्थ्य को नुकसान
पर्यावरण विदों का मानना है कि खंती में 18 लाख मैट्रिक टन कचरा दबा होने का अनुमान है। इतनी बड़ी तादात में कचरा होने से यहां मीथेन गैस का भंडार है। ऐसे में यदि बड़ी मात्रा में मीथेन गैस हवा में छोड़ी जाती है तो यह आसपास के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी। इससे जलवायु परिवर्तन तक हो सकता है। जानकारों का यह भी मानना है कि खंती में बनने वाली मीथेन गैस को खुले में न छोडक़र इसे स्टोर किया जा सकता है। यह गैस अत्यंत ज्वलनशील होती है। इसका उपयोग खाने बनाने सहित बिजली बनाने में भी किया जा सकता है। इससे निगम करोडों रुपए कमा सकता है। खंती पर निगम 52 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है, इस गैस के उपयोग से लागत घट सकती है। बताया जाता है कि खंती से पौने तीन करोड़ लाख किलो मीथेन गैस बनेगी। एक टन कचरे से 55 क्यूबिक मीटर मीथेन गैस बनती है। किलो में गणना करें तो यह 27 किलो गैस होती है। खंती में 18 लाख मैट्रिक टन कचरा मौजूद है। इसमें आधा कचरा कार्बनिक और आधा अकार्बनिक है। ऐसे में कचरे से 9 लाख मैट्रिक टन गैस उत्पन्न होने का अनुमान है। इस तरह 9 लाख मैट्रिक टन कचरे से करीब पौने तीन लाख किलो मीथेन गैस बनेगी। यह गैस करीब 60 दिन तक निकलेगी।
 

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