फ्रांस के संबंध में भारत की दृष्टि दुनिया के सभी दृष्टिकोणों से सर्वथा भिन्न है। भारतीय मनीषियों का सदैव प्रयास रहा कि विज्ञान विनाश के लिए नहीं, सृजन के लिए होना चाहिए। भारत में विज्ञान की जो थाती रही है, उसमें इस बात के संकेत स्पष्टतौर पर मिलते हैं। सामान्य जन को ध्यान में रखकर विज्ञान में अनुसंधान भारत में हुए हैं। इसलिए भारत की विज्ञान परंपरा उज्ज्वल और उन्नत रही है। विज्ञान की उसी भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाने का आग्रह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंफाल में आयोजित 105वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों से किया है। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वह वक्त आ गया है जब रिसर्च एंड डिवेलपमेंट की अवधारणा को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। इसे अब रिसर्च फॉर डिवेलपमेंट कहा जाए, अर्थात विकास के लिए अनुसंधान। प्रधानमंत्री ने उचित ही कहा कि विज्ञान का उद्देश्य समाज की तरक्की और जनकल्याण है।  ऐसा नहीं है कि अभी जो अनुसंधान हो रहा है, उससे समाज का विकास नहीं हो रहा। किंतु, वास्तविकता यही है कि अभी जितना भी अनुसंधान किया जा रहा है, उसके पीछे समाज कल्याण नहीं, अपितु निजी स्वार्थ और लोभ ही प्रमुखता है। इसलिए आज जितने भी वैज्ञानिक आविष्कार हो रहे हैं, उसका लाभ सामान्य व्यक्ति को उतना नहीं मिल पा रहा है, जितना मिलना चाहिए। इसलिए आज इस बात की आवश्यकता है कि सामान्य व्यक्ति की कठिनाइयों और उसके हित को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक गतिविधियां प्रारंभ की जाएं। आवश्यक है कि वैज्ञानिक अपनी उपलब्धियों को समाज तक पहुंचाएं, जिससे युवाओं में वैज्ञानिक सोच का विकास हो। इन बातों से उम्मीद बंधती है कि सरकार देश में शोध और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए कारगर योजनाएं लाएगी। आज कई देशों ने विज्ञान और तकनीक के सहारे तेजी से विकास किया है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण चीन है। लेकिन यह हासिल करने के लिए इसने बुनियादी स्तर से ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर दिया, शोध और अनुसंधान पर भारी निवेश किया। हमारे यहां स्कूली स्तर पर विज्ञान की पढ़ाई का हाल बहुत अच्छा नहीं है। 1964-65 में बने कोठारी आयोग ने पहली बार सुझाव दिया था कि कक्षा दस तक सभी लड़के और लड़कियां विज्ञान और गणित अनिवार्य रूप से पढ़ेंगे। उसके बाद के दस-पंद्रह वर्षों में यह सारे देश में लागू भी हो गया, मगर उसके लिए जरूरी सुविधाओं और प्रयोगशालाओं की व्यवस्था पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया। जहां तक शोध की बात है तो अनेक आईआईटी की स्थापना तकनीकी शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी ताकि देश के विकास के लिए जरूरी तकनीक तैयार हो सके और भारत सही अर्थों में आत्मनिर्भर बन सके। किंतु, हो क्या रहा है। यहां से निकले युवा अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में भाग जाते हैं। शोध के लिए बने इन संस्थानों के अपने मूल उद्देश्य से अलग होने की वजह से ही भारत शोध में पिछड़ता चला गया। कभी दुनिया भर में होने वाले शोध कार्य में भारत का योगदान नौ फीसद था, जो आज घटकर महज 2.3 फीसद रह गया है। कहना होगा कि निकट भविष्य में विश्व पटल पर भारत स्वयं को जहाँ देख रहा है, वहाँ पहुंचने के लिए विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करना होगा। शोधकार्यों को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी और विज्ञान के क्षेत्र में आने वाली पीढ़ी का प्रबोधन भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार करना होगा। 

                                                                                                                                                                 अवधेश कुमार

विदेश