देश  में एक बार फिर हिन्दू आतंकवाद का शोर शुरू हो गया है। इस्लामी आतंकवाद का विस्तार होते जाने और राजनीतिक पराभव की कुंठा से उबरने के लिए देश में जैसा माहौल है, उसका सम्यक संज्ञान लेने के बजाय किन्हीं राज्यों में चुनावी सफलता के लिए देशहित को दरकिनार कर जो अभियान एक दशक बाद कर्नाटक चुनाव के एक पूर्व गौरी लंकेश हत्या के आरोप में एक व्यक्ति को पकड़कर हिन्दूवादी संगठनों को बदनाम करने का दूरगामी परिणाम क्या होगा? एक दशक पूर्व मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में गृहमंत्री पद पर सुशोभित सुशील कुमार शिन्दे को, संघ और उससे जुड़े कुछ संगठनों को ''भगवा आतंक'' फैलाने के वक्तव्य पद माफी मांगने के लिए विवश होना पड़ा था। मुस्लिम आबादी और पूजा स्थलों पर बमबारी करने के आरोप में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, श्रीकांत पुरोहित तथा स्वामी जैसे तमाम लोगों को एक दशक तक जेल में रखकर उत्पीडऩ करने के बावजूद संप्रग सरकार के निर्देशन में चल रही जांच एजेंसियों की जो दुर्दशा हो रही है, उसका संज्ञान लेकर अपने आचरण में सुधार करने और जो वास्तव में देश को तोडऩे का काम कर रहे हैं, उनका शमन करने में सहयोग करने के बजाय मोदी विरोधी देश को तोडऩे या फिर से जुट गए हैं। पाकिस्तानपरस्ती का खुलकर प्रदर्शन करने यहां तक कि मोदी को हटाने के लिए उससे सहयोग की याचना करने में भी जिन्हें संकोच नहीं है, वे तत्व किन्हीं व्यक्तियों की हत्या किसी समूह का गौरक्षा के नाम पर उपद्रव करवा और ट्रेन में यात्रा करते समय बैठने को लेकर मारपीट को सांप्रदायिक संघर्ष के रूप में बार-बार उभारने, आर्थिक नीतियों के खिलाफ लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने में असफल होने के बाद जहां मिलजुलकर मुकाबला करने की बहुविधि चर्चाएं चल रही है, वहीं साप्रदायिकता को उभारने के लिए हिन्दू आतंकवाद का पांसा फिर से फेंक दिया गया है। यह ''आतंकÓÓ जो पहले गुजरात तक सीमित बताया गया था, उसको देशव्यापी साबित करने में गड़बड़ी हो रही है ताकि जो देश के टुकड़े-टुकड़े करने में विश्वास रखते हैं या जो पाकिस्तान से टुकड़ा पाकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक ''काटनेÓÓ के लिए उपक्रम कर रहे हैं, उनकी ओर से ध्यान हटाने का समझी बूझी या मूर्खतावर्श किया जा रहा प्रयास ही कहा जा रहा है क्योंकि मोदी विरोध का इन लोगों का एक ही तरीका समझ में आता है, सांप्रदायिक उन्माद को उभारना। गुजरात के बाद एक के बाद एक राज्यों में मात खाये जाते रहने और वहां के चुनाव में 'जनेऊधारी हिन्दूÓ के पाखंड खड़ा करके ही सही जो सफलता प्राप्त किया था, उसका भी आचरण में बदलाव के लिए प्रेरित नहीं कर पा रहा है। कोई भी आदत छूटने में मुश्किल होती है। अल्पसंख्यक अर्थात मुसलमान को तुष्ट करने के लिए किए गए उपायों का परिणाम भोगने के बाद भी उनकी नहीं भूल रही है।
सत्ता में बैठी मोदी सरकार का विरोध करना राजनीतिक आचरण है लेकिन जो इस विरोध के लिए ऐसे उपायों का सहारा लिया जाय, जो देशहित विरोधी हो तब इसे क्या कहा जाय। गुजरात के चुनाव में कांग्रेस को जनेऊ धारण करने के कारण सफलता नहीं मिली, जो सफलता मिली, भाजपा का बहुमत कम करने में उसका श्रेय हार्दिक पटेल और जिग्नेश को जाता है जिन्होंने जातीयता की भावना को उभारकर कांग्रेस की मदद की। यही तरीका कर्नाटक की सत्ता में बन रहने के लिए कांग्रेस फिर अपना रही है। लियायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए आयोग बैठाना, टीपू सुलतान को महिमामंडित कर मुसलमानों को खुश करना, गौरी लंकेश की हत्या के लिए किसी व्यक्ति से गिरफ्तार की वामपंथियों को सांस लेने का लिए आक्सीजन मुहैया कराना आदि ऐसे उपाय हैं जिसके सहारे सिद्धरमैय्या अपना बेड़ा पार लगाने में जुटे हैं। जनेऊधारी अध्यक्ष को गुजरात के समान मंदिरों में दर्शन कराने की योजना में इसी रणनीति का अंग है। कांग्रेस या अन्य जो भी गुजरात के मसा नही यहां भी विघटन से लाभान्वित का आंकलन कर रहे हैं वे यह भूल जाते हैं  िकइस समय असंतोष का लाभ कांग्रेस नहीं भाजपा को मिल सकता है। एक और तथ्य संज्ञान में लेने की आवश्यकता है। कश्मीर के बाद सबसे अधिक इस्लामीवादी उग्रवादी की भर्ती कर्नाटका से ही हो रही है। उससे लगे केरल में तो वाकायदा पोस्टर लगाकर हिन्दुओं की विभिन्न जनजातियों की लड़कियों को इस्लाम में लाने के लिए मूल्य देने की जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने यद्यपि हदिया को बालिग होने के कारण अपने पति के साथ जाने की इजाजत दे दिया लेकिन न्यायालय से संरक्षण पाने के बाद वह पति के साथ सबसे पहले उस इस्लामीकरणवादी फेडरेशन पार्टी के मुख्यालय गई जो लव जेहाद को अपना घोषित कार्यक्रम बना चुकी है। केरल की विजयन के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार के राज में माक्र्सवादी पार्टी छोड़कर भाजपा तथा कांग्रेस में जाने वालों को घेरकर जिस तरह से हत्या की जा रही है, वह सोवियत यूनियन के लेनिन की याद ताजा कर देता है जिसने मतभेद हो जाने के कारण देश छोड़कर भाग जाने वाले दारूरकी को स्पेन में मरवा दिया था। इस्लामी और वामपंथी उग्रवादी धर्म परिवर्तन और हत्या में लगी ताकतों की हरकतों पर से ध्यान हटाने के लिए एक बार फिर से हिन्दू आतंकवाद को नारे के रूप में उभारने की कोशिश हो रही है। मनमोहन सिंह के देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार घोषित करने की जो प्रतिक्रिया हुए है उसके लोकसभा और एक के बाद एक विधानसभा चुनावों में प्रगटीकरण का भी संज्ञान नहीं ले रही है क्योंकि उसका एक लीक पर ही चलते रहने की आदत छूट नहीं पा रही है।
राहुल गांधी को सिंगापुर में एक अर्थशास्त्री ने और बंगाल से राज्यसभा के लिए कांग्रेसी वकील मनु अभिषेक सिंघवी को समर्थन देकर तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों को जो झटका दिया है, तथा कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता पी. चिदंबंरम के बेटे कीर्ति चिदंबरम को जेल जाने से राहत देने से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने कांग्रेस की धूमिल हो गई छवि को संवारने के लिए किए जा रहे सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया है। जिस प्रकार इसाई बाहुल्य मेघालय और नागालैंड के राजनीतिक दलों के साथ भाजपा ने तादात्म स्थापित किया है, और तीन तलाक के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के अनुरूप कानून बनाने की भाजपा की पहल को राज्यसभा में बहुमत का लाभ उठाकर रोके रखने का काम कांग्रेस ने किया है, उसके बाद मुसलमानों में भी भाजपा की पैठ होते जाने को उसाउद्दीन ओवैसी के सहारे कम करने के प्रयास में कांग्रेस और वामपंथी असफल ही नहीं हुए हैं, धाराशायी हो गए हैं, उसके बावजूद सोनिया गांधी का यह दावा कि 2019 में कांग्रेस फिर से सत्ता में आयेगी और भाजपा के नारे का 2004 के साइनिंग इंडिया के समान होगा-पर तो उनके उत्तराधिकारी बेटे को भी भरोसा नहीं है जो यह मानने पर आ गए हैं कि उनकी पार्टी के दस वर्षीय शासन का अंत और निरंतर होती जा रही दुर्दशा का कारण आपसी मतभेद और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर जाने का परिणाम है। पता नहीं राहुल गांधी ने जब यह बात कही तब उन्हें अपनी और अपनी माता का इसी प्रकार के आरोप में रहने का संज्ञान था, या नहीं। कांग्रेस-चाहे विघटनकारी ताकतों पर संरक्षण प्रदान करने का वाहवाही, परिवार की प्राथमिकता हा या भ्रष्टाचारियों को मदद करने का मामला जैसा नीरव मोदी के मामले के खुलासे से जारी हो रहा है, अपने को अलग कर पाने में असफल है। वामपंथी त्रिपुरा में ध्वस्त होने के बाद विपक्षी एकता के लिए विक्षिप्त होकर प्रयास कर रहे हैं लेकिन एकजुटता के लिए जो क्षमता हरकिशन सिंह सुरजीत में थी वह अपनी ही पार्टी में हाशिए पर रहे सीताराम याचुरी की नहीं है। हताशा की स्थिति में एकजुटता, देशहित विरोधियों को संरक्षण और देश के अस्सी प्रतिशत आबादी वाले हिन्दुओं में हत्यारे आतंकवादी ढ़ूंढऩे की कोशिश का परिणाम भी स्पष्ट है। हिन्दू जाग चुका हे जाति पात के भेद की दीवार खड़ी करने का प्रयास को अब अंजाम देना संभव नहीं है।

                                                                                                                                                        राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

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