दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अकाली दल के नेता बिक्रम मजीठिया से माफी मांगने को लेकर शुरू हुआ बवाल अब थमने का नाम नहीं ले रहा। केजरीवाल माफी मांगने को लेकर अपनों के साथ-साथ विपक्ष के निशाने पर भी आ गए हैं। केजरीवाल के इस माफीनामे से यह भी स्पष्ट हो गया है कि पलटी मारने में उनसे बड़ा कोई नहीं है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में कहा जाता है कि वह 'आरोप लगाओ और भाग जाओÓ को हथियार बनाकर अपनी राजनीति करते रहे हैं। उनका यह हथियार अब उन्हें ही घायल कर रहा है। केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने से पहले दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर भी जमकर आरोप लगाए थे, किंतु वह उन आरोपों को सरकार में आने के बाद आज तक प्रमाणित नहीं कर सके। उन्होंने यह भी दावा किया था कि सरकार में आते ही शीला दीक्षित सरकार के घोटाले उजाकर कर उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी, लेकिन हुआ क्या, यह सबके सामने है। इसी प्रकार वह वित्तमंत्री अरुण जेटली से भी माफी मांग चुके हैं। उस माफीनामे के कारण उनके अधिवक्ता राम जेठमलानी काफी नाराज हुए थे। फिलहाल, मजीठिया से माफी मांगने पर उनकी पार्टी में उठा-पटक शुरू हो गई है। आआपा के बागी नेता एवं कवि कुमार विश्वास ने केजरीवाल पर बहुत कड़ी टिप्पणी की। जबकि सांसद भगवंत मान ने पंजाब पार्टी अध्यक्ष के पद से त्याग-पत्र दे दिया है। आम आदमी पार्टी के ही राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भी केजरीवाल से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि कई लोग नाखुश हैं। पंजाब से आपापा विधायक और विपक्ष के नेता सुखपाल सिंह खैरा ने भी ट्वीट कर कहा कि अरविंद केजरीवाल के माफी मांगने से हम पूरी तरह स्तब्ध हैं। हमें इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है कि हमसे इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गई। वहीं, कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने भी केजरीवाल को घेरते हुए कहा कि मजीठिया से माफी मांगकर केजरीवाल ने बुजदिली दिखाई है। यह पंजाब के लोगों के साथ धोखा है। मुझे लगता है कि केजरीवाल ने पंजाब में आम आदमी पार्टी की हत्या कर दी है, मानो उनका अस्तित्व मिटा दिया गया हो। वे अब पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ किस मुंह से बात करेंगे? यह सब टिप्पणियां बताती हैं कि अरविंद केजरीवाल को यह माफी पार्टी के भीतर और बाहर भारी पड़ सकती है। लेकिन, यह भी सत्य है कि अरविंद केजरीवाल के पास अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए कोई प्रमाण नहीं मिल पाए हैं। उनके पास माफी मांगने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि मजीठिया को कोई प्रमाण-पत्र मिल गया है। किंतु, यह प्रकरण हमारे राजनेताओं के लिए एक सबक की तरह तो है ही। राजनीति में विरोधी को घेरने के लिए नेता एक-दूसरे पर अनर्गल आरोप लगाते हैं। उनके पास प्रमाण हो या न हो, कहे-सुने को आधार बनाकर भी आरोप लगाए जाते हैं। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी भी अपनी राजनीति ऐसे ही करती रही है। उनको उदाहरण मानकर अब सब नेता यह सबक ले सकते हैं कि किसी पर गंभीर और व्यक्तिगत आरोप लगाने से पहले पर्याप्त प्रमाण प्राप्त कर लेना चाहिए। वैसे भी यह अनुचित ही है कि हमें बिना तथ्यों और तर्कों को आधार मानकर किसी पर आरोप लगाएं।

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