हाल के दिनों में देश में कुछ ऐसे घटनाक्रम सामने आए, जो भारत की राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं के उज्जवल पक्ष को रेखांकित करते है व कई प्रश्नों को जन्म भी देते है। वैचारिक विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को शत्रु मानने से क्या देश में लोकतंत्र और संविधान को अक्षुण्ण रखा जा सकता है? त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में ढाई दशक के वाम शासन के अंत के बाद जब प्रदेश की राजधानी अगरतला में भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हो रहा था, तब उस समय मंच पर राजनीतिक शिष्टाचार का एक विलक्षण और आदर्श उदाहरण देखने को मिला। कहने को भाजपा और वामपंथी गुट-दो अलग ध्रुव है, जो एक दूसरे के वैचारिक प्रतिरोधी हैं। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और त्रिपुरा के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने वामपंथी नेता और निवर्तमान मुख्यमंत्री माणिक सरकार से राजनीतिक शिष्टाचार का अभूतपूर्व परिचय दिया।
पहले मुख्यमंत्री की शपथ लेने से पहले बिप्लब देब और भाजपा महासचिव राम माधव ने त्रिपुरा में लगातार 20 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार को उनके आवास पर जाकर शपथ ग्रहण समारोह निमंत्रण दिया, जिस स्वीकारते हुए वह पहुंचे भी। शपथ समारोह में प्रधानमंत्री सहित शीर्ष भाजपा नेता न केवल माणिक सरकार से गर्मजोशी से मिले, अपितु प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं समारोह समाप्त होने पर उन्हे उनके हाथ में हाथ डालकर विदाई दी और एकांत में कुछ क्षण बातचीत भी की। इस प्रकार का आचरण भारतीय संस्कृति और उसकी अनंतकालीन बहुलतावादी परंपरा का मूर्त रुप है, जिसके अनेकों उदाहरण भारतीय समाज और शेष विश्व में बसे भारतवंशियों में वयोवृद्धों को आदर, सम्मान और अनुजों से स्नेह के रुप में अक्सर देखनों को मिलते है। हम में से अधिकतर लोग राजनीतिज्ञों को कोसते है, किंतु जब बात राष्ट्रहित पर प्रश्न की हो, तो आपसी मतभेद भुलाकर देश के राष्ट्रीय दल एक स्वर में बोलते है। गत माह लंबे प्रवास पर भारत पहुंचे कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडोडो से संबंधित खालिस्तान का मामला और भारत की प्रतिक्रिया- इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यद्यपि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह राजनीतिक रुप से धुर-विरोधी है। किंतु जब कनाडाई प्रधानमंत्री ने दोनों भारतीय नेताओं से भेंट की, तो उन्होंने दो टूक शब्दों में और एक स्वर में संदेश दे दिया- भारत की संप्रभुता, सार्वभौमिकता और अखंडता के साथ किसी भी तरह का समझौता सहन नहीं किया जाएगा। कनाडा की भारत के साथ निकटता और खालिस्तानियों से सहानुभूति- दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।
राजनीतिक मतभेदों के बीच देश में राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने का एक सुखद इतिहास है और 1990 के दशक की एक घटना- किसी मील के पत्थर से कमतर नहीं है। वर्ष 1994 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर में मानवाधिकारों के तथाकथित उल्लंघन को लेकर मुस्लिम देशों के समूह इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के माध्यम से भारत को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में घेरने की रणनीति बनाई, तब भारतीय राजनीतिज्ञ सभी वैचारिक विरोधों के बाद भी एक हो गए। यदि उस समय पाकिस्तान का आरोप सिद्ध हो जाता, तो संयुक्त राष्ट्र भारत पर कई प्रकार के प्रतिबंध थोप देता।
पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रस्ताव पर सुनवाई के लिए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर और राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानते हुए, उस समय के नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का मुखिया बनाकर जिनेवा भेजा, जिसमें सदस्य के रुप में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारुख अब्दुल्ला भी शामिल रहे। कश्मीर संबंधित पाकिस्तान का झूठ अटल बिहारी वाजपेयी की बुद्धिमत्ता और तर्कपूर्ण पैरवी व नरसिम्हा राव सरकार की रणनीति के समक्ष टिक नहीं पाया।  भारतीय वांग्मय और परंपराओं में मतभेद कभी मनभेद नहीं बना। धुर-विरोधी एक दूसरे का यथोचित सम्मान करते हुए अपने-अपने मत को शास्त्रार्थ के माध्यम से सही सिद्ध करने का प्रयास करते थे। यह परंपरा सनातन काल से अविरल चली आ रही है। कांग्रेस के नाम पर जब देश में स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हुआ तब उसमें हर तरह की विचारधारा, नरमपंथ और गरमपंथ- मतों के लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर एक दूसरे का साथ दिया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस अपने उग्र विचारों के लिए प्रख्यात थे। वर्ष 1939 में गांधीजी के विरोध के बाद भी नेताजी बोस कांग्रेस के पुन: अध्यक्ष चुने गए। किंतु इसके तुरंत बाद उन्होंने त्यागपत्र देकर विदेश से अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध प्रारंभ किया। उस समय नेताजी रेडियो पर बात करते वक्त गांधीजी का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया करते थे।
यही नहीं, जब 15 अगस्त 1947 में भारत ब्रितानी बेडिय़ों से स्वतंत्र हुआ और गांधीजी के जीवनकाल में पंडित जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में देश की पहली सरकार का गठन हुआ, तब उसमें गैर-कांग्रेसी डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉक्टर भीमराम अंबेडकर को भी क्रमश: वाणिज्य उद्योग मंत्री और कानून-न्याय मंत्री के रुप में शामिल किया गया था। यही नहीं, जब 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया, तब जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने सीमा पर सैनिकों को आवश्यक सहायता भेजने हेतु कई शिविर लगाए और जनजागरण अभियान चलाया। जिस पं.नेहरु सरकार ने वामपंथियों के दुष्प्रचार से प्रभावित होकर गांधीजी की हत्या के पश्चात संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था, उन्होंने अपनी भूल का प्रायश्चित वर्ष 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को स्वयं आमंत्रित करके किया। कई पाठकों को जानकर आश्चर्य होगा कि 27 सितंबर 1925 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने से पहले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार विदर्भ कांग्रेस के प्रांतीय सचिव थे, वहीं 25 दिसंबर 1925 को गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और केरल के पहले माक्र्सवादी मुख्यमंत्री रहे ई.एम.एस नंबूदरीपाद भी युवाकाल में कांग्रेस से जुड़े थे। नौ दशक के कालखंड में जहां संघ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारतीय विमर्श के केंद्र में है, वहीं वामपंथी विचारधारा विश्व के अन्य भागों के साथ-साथ भारत में भी लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है। 
त्रिपुरा में जिस प्रकार का शिष्टाचार भाजपा नेताओं द्वारा माणिक सरकार के संदर्भ में दिखाया, उससे एक महत्वपूर्ण सत्य दृष्टिगोचर होता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वैचारिक कारणों से दो लोग या दल प्रतिद्वंद्वी तो हो सकते हैं, किंतु शत्रु नहीं होने चाहिए। भारत में इस प्रकार की परिपाटी का एक सुनहरा इतिहास है। फिर किसने विचारधारा के नाम पर शत्रुता और हिंसा का बीजारोपण किया 
इस विकृति के लिए विदेश आयातित वह मार्क्सवादी सोच और उससे जनित राजनीतिक दल जिम्मेदार है- जिनका लोकतंत्र, मतभेद के अधिकार और अन्य मानवाधिकारों में कोई विश्वास नहीं। वामपंथ में प्रतिरोधी विचार का पनपना- विशेषकर भाजपा-संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा को अंगीकार करना, एक ऐसा अपराध है, जो ईशनिंदा से कम नहीं- जिसमें इस्लामी कट्टरपंथियों ने मौत ही एकमात्र सजा सुनिश्चित की है। जिस प्रकार आतंकी-जिहादी अपने नृशंस कृत्य को न्यायोचित ठहराने के लिए इस्लाम और कुरान को उद्धृत करते है, उसी तरह विचारधारा के नाम पर अपने विरोधियों को कुचलने की प्रेरणा- वामपंथियों को कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ और पोल पॉट के चिंतन से प्राप्त होती है। त्रिपुरा, केरल और प. बंगाल में वैचारिक विरोधियों की हत्या- उसकी तार्किक परिणति है।
वर्ष 2002 के गुजरात दंगों को लेकर जब देश में विपक्षी दलों और विदेशी एजेंडे पर काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों के कुप्रचारों से प्रभावित होकर अमेरिका के कुछ सांसदों ने राज्य के निर्वाचित तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान किया, तब वामपंथियों सहित अधिकतर विरोधियों ने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति हेतु अमेरिका के इस कदम का सहर्ष स्वागत किया। प्रतिकूल इसके जब हाल में खालिस्तान मामले में पंजाब के मुख्यमंत्री कै.अमरिंदर सिंह की कनाडा सरकार ने उपेक्षा करने की कोशिश की, तब प्रतिक्रिया स्वरूप मोदी सरकार ने जो कूटनीति अपनाई, उसके मुरीद विरोधी भी हो गए। आशा है कि प. बंगाल और केरल में वामपंथियों को इससे सकारात्मक संदेश मिल गया होगा।

                                                                                                                                                                बलबीर पुंज

विदेश