लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभा सीट के लिए होने वाले उपचुनाव में भाजपा का प्रदर्शन निराशाजनक है। उपचुनाव के परिणाम भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के लिए पहेली की तरह बने हुए हैं। क्योंकि, एक तरफ उपचुनाव में भाजपा को एक के बाद एक हार का सामना करना पड़ रहा है, वहीं पूर्ण निर्वाचन में उसकी झोली में बड़ी-बड़ी जीत आ रही हैं। भाजपा ऐसे राज्यों में भी अपना झंडा फहराने में सफल हो रही है, जहाँ उसकी उपस्थिति पहले कभी कल्पना में भी नहीं थी। उत्तरप्रदेश की दो लोकसभा सीट और बिहार की एक लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम भी भाजपा के पक्ष में नहीं आया है। गोरखपुर की सीट हारना भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका है। यह हार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने भी एक बड़े प्रश्न के रूप में है। गोरखपुर से पांच बार सांसद रह चुके योगी के त्याग-पत्र देने के बाद ही यह सीट रिक्त हुई थी। भाजपा आलाकमान फूलपुर लोकसभा सीट को लेकर तो आशंकित था, परंतु गोरखपुर में उसे कोई संदेह नजर नहीं आ रहा था। क्योंकि, गोरखपुर की सीट भाजपा की परंपरागत सीट है। वहाँ से पहले योगी आदित्यनाथ के गुरु और उनके बाद वे स्वयं जीतते आ रहे हैं। इन नतीजों को लेकर सपा-बसपा का उत्साहित होना तो बनता है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के लिए यह चेतावनी की तरह है। दोनों ही जगह कांग्रेस को जो वोट प्रतिशत मिला है, वह उसके लिए खतरे की घंटी है। जिस संसदीय क्षेत्र से पंडित जवाहर लाल नेहरू चुनाव लड़ते थे, कांग्रेस प्रत्याशी वहां अपनी जमानत भी नहीं बचा सके हैं। चुनाव परिणाम के आधार पर यह भी कहा जा रहा है कि वर्ष 2019 में भाजपा से मुकाबला गठजोड़ की राजनीति से ही किया जा सकता है। आपसी बैर-भाव भुलाकर साथ आना होगा, जैसे बसपा प्रमुख अपने साथ हुए शर्मनाक घटना को भुलाकर सपा के साथ गईं। सपा-बसपा के गठजोड़ ने उत्तरप्रदेश की राजनीति में ही नहीं देश की राजनीति में भी तीसरे मोर्चे के गठबंधन को हवा दी है। यह तीसरा मोर्चा कांग्रेस को अलग रखकर है। बहरहाल, अभी यह कहना भी जल्दबाजी होगा कि अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव में यह गठबंधन बना रहेगा और प्रभावी रहेगा। दरअसल, गोरखपुर और फूलपूर दोनों ही जगह बसपा-सपा गठबंधन के प्रत्याशी हाथ मिलाने के बाद भी बहुत बड़े अंतर से नहीं जीत सके हैं। एक-दो चुनाव साथ मिलकर लड़ लेना आसान है, परंतु गठबंधन धर्म को लम्बे समय तक चलाने का बसपा सुप्रीमो मायावती का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। वह कब बिदक जायें और गठबंधन तोड़ दें कोई नहीं जानता है। जब मुकाबला 80 सीटों पर एक साथ होगा तो चुनाव की राह इतनी आसान नहीं होगी, उस समय वोट प्रतिशत अगर बढ़ेगा तो इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा, जैसा कि 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देखने में आया था। उप-चुनाव के नतीजों का विश्लेषण किया जाए तो यह साफ नजर आता है कि बसपा-सपा की जीत का बड़ा कारण भाजपा के मतदाताओं का मतदान स्थल तक नहीं पहुंचना था, न कि योगी सरकार के कामकाज से जनता की नाराजगी। भाजपा बूथ प्रबंधन में इस बार असफल हुई है। 

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