उत्तर पूर्व क्षेत्र के राज्य छोटे होने से उनका महत्व राष्ट्रीय राजनीति मेें विशेष नहीं था। असम की चर्चा इसलिए होती थी कि वहां बांग्लादेश घुसपैठियों की समस्या गंभीर हो गई, असम गणपरिषद के द्वारा अवैध घुसपेठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया लेकिन समस्या बनी रही। बोडो लिबरेशन टाइगर्स की हिंसा भी हुई लेकिन भाजपा की अटल सरकार के समय एल.टी. के लड़ाकों ने हथियार डालकर अपने एक वर्ष पुराने संघर्ष को खत्म कर दिया। अरूणाचल को चीन अपना भाग बताने से भी राष्ट्रीय चिंता का सवाल बना रहा। बोडो ने भी हिंसा का रास्ता इसलिए पकड़ा था कि अपनी भाषा, परम्परा, साहित्य के संरक्षण की चिंता ने गुस्से को जन्म दिया। उल्फा उग्रवादियों के प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट करने की कार्यवाही भी भाजपा की अटल सरकार के समय 2003 में की गई। असम में बांग्लादेशी घुसपेठियों का कांग्रेस ने राजनीतिकरण किया और उन्हें मतदाता सूची में शामिल कर समस्या को गंभीर बनाया। स्वयं नेहरूजी विदेशी घुसपैठियों को बाहर करने के खिलाफ थे। नागालैण्ड में भी अलग नागालैण्ड की मांग जोर पकड़ती रही। पूर्वांचल भारत की अखंडता और सुरक्षा की दृष्टि से महत्व का क्षेत्र है। सबसे पहले इस क्षेत्र के राष्ट्रीय महत्व पर ध्यान केन्द्रित करते हुए एनडीए की अटल सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय की स्थापना की। 'पूर्व की ओर देखोÓ नीति को अटल सरकार के कार्यकाल में व्यापक संवर्धन मिला। कांगे्रस सरकारों की विडंबना यह रही कि राष्ट्रीय अखंडता एवं सुरक्षा के महत्व की बजाय इस क्षेत्र को दलीयहित से देखा गया। यही कारण है कि राजनैतिक दल-दल में पूर्वांचल कांगे्रसी शासन काल में फंसा रहा। हालांकि राष्ट्र की एकता अखंडता के महत्व को समझते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्ण कालिक प्रचारको ने इस क्षेत्र में संघ कार्य का विस्तार किया, २००३ में जब त्रिपुरा में माक्र्सवादी माणिक सरकार थी, तब चार संघ प्रचारकों की निर्मम हत्या कर दी गई, गत एक वर्ष भी जिन ग्यारह कार्यकर्ताओं की हत्या की गई, वे सब संघ के स्वयंसेवक थे। अपने जीवन को खतरे में डालकर भी संघ के स्वयं सेवक राष्ट्र कार्य के लिए डटे हैं। 
    आज जो राजनैतिक बदलाव हुआ है, मिजोरम के अलावा सारा पूर्वांचल सांस्कृतिक भगवा रंग में रंगा हुआ है। त्रिपुरा की २५ वर्ष से जमी हुई माक्र्सवादी माणिक सरकार अपराध, अत्याचार और अराष्ट्रीय गतिविधियों की पर्याय बन गई थी। माक्र्सवादी कैडर ही शासन-प्रशासन पर काबिज था, आम जनता ने माक्र्सवादी तानाशाही से त्रस्त थी। जब त्रिपुरा में जनता, कम्युनिस्टों को नकार कर भाजपा को भारी बहुमत से विजयी बनाया तो जश्न मनाते हुए एक युवक कह रहा था कि हमें कम्युनिस्टों की कैद से आजादी मिल गई। उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए यह विजय २०१४ से भी अधिक महत्व की इसलिए है कि कांगे्रस के किलो को ध्वस्त भाजपा ने कई बार किया लेकिन कम्युनिस्टों के अजेय गढ़ को ध्वस्त को ध्वस्त करने का यह पहला अवसर है। जिस तरह सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त करने से सबसे अधिक संतोष और प्रसन्नता माता जीजा बाई को हुई थी, इस विजय से राष्ट्रवादी जनता को भी सबसे अधिक प्रसन्नता हुई है। अभी तक कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंदी पर था। 21 राज्यों में भाजपा का शासन हो गया है। अमित शाह ने संकल्प व्यक्त किया है कि केरल के अंतिम कम्युनिस्ट गढ़ पर भी विजय प्राप्त करेंगे। इसी प्रकार कर्नाटक में भी भाजपा की विजय पक्की है।  राष्ट्रवादी विजय पताका पूरे देश में फहरा रही है। राजनैतिक बदलाव के साथ ऐतिहासिक वैचारिक बदलाव हुआ है, जिस जांतपात, परिवार की राजनीति से लोकतंत्र का चेहरा विकृत दिखाई देने लगा था, वे बुराइयां राष्ट्रवादी विकास की धारा में बह गई है। अब विकास की ऐसी राजनीति का युग प्रारंभ हुआ, जो न्यू भारत, महान भारत, शक्तिशाली भारत के इतिहास की रचना करेगा। विकास के साथ उस छद्म देश विरोधी तत्वों पर भी अंकुश लगेगा जो भारत की संस्कृति परम्परा और राष्ट्रीयता को भी छिन्न-भिनन करना चाहते है।
गत साठ दशकों से ऐसे सपोलो को राजनैतिक कारणा से अवसर मिलता रहा। यह इतिहास की सच्चाई है कि कांग्रेस के नेहरू नेतृत्व की राष्ट्रघाती नीतियों से भारत का खूनी विभाजन हुआ, कश्मीर की बर्बादी और आतंकवाद भी कांग्रेस नेतृत्व की देन है। पूर्वांचल को भी अपने भाग्य पर छोड़ देने का पाप भी कांग्रेस ने किया। सीमा के सुरक्षा कवच को सुदृढ़ करने की बजाय उसे कमजोर किया गया। सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने की दोषी भी केवल कांग्रेस रही। दलहित के लिए राष्ट्रहित की अनदेखी की जाती रही। मोदी सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल में भारत ने न केवल विकास की नई ऊँचाई को छुआ बल्कि सुरक्षा के साथ महाशक्तिशाली (सुपर पॉवर) चार देशों में भारत एक है। सबसे अधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों ने नरेन्द्र मोदी का नाम है। चीन को भी भारत से टकराने की हिम्मत नहीं है। कांग्रेस परिवार की मुखिया सोनिया गांधी जो मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाती हुई भानुमति का कुनबा बनाकर भाजपा को हराने की बात कर रही है, वे क्या अपने कांग्रेस की यूपीए सरकार के समय में भारत की स्थिति का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करेगी? जिनकी झूठ, फरेब का राजनैतिक कर्मकांड है वे सच्चाई का सामना करने से घबराते है। 
उत्तर पूर्व के  राजनैतिक बदलाव के साथ ही कई प्रकार की प्रतिक्रिया और बदलाव के संकेत मिल रहे है, चलो पल्टाई के क्रांतिकारी उद्घोष के साथ भारत माता की जय, वंदे मातरम् का जयकारा इस क्षेत्र में हर तरफ गूंजने लगा है। पहले लाल सलाम के नारे लगते थे, जो विदेशी विचार और तानाशाही के प्रतीक थे। अब चारों ओर संस्कृति के प्रतीक सूर्योदय का केशरिया आलोक फैला हुआ है। इस बदलाव के साथ ही अपनी संस्कृति, अपनी परम्पराएं, अपने महापुरूष और अपना भारत की भावना सुदृढ़ हुई है। इस बदलाव के साथ विदेशी शक्तियां, जो इस क्षेत्र के लोगों में अलगाव की देशविरोधी साजिश कर रही थी, वे अब राष्ट्रवादी विचार प्रवाह के कारण अपने बचाव या पलायन की स्थिति में है। जनजाती की संख्या इस क्षेत्र में अधिक है, उनके बीच भी यह भ्रम फैलाया जा रहा था कि तुम्हारी संस्कृति, परम्परा अलग है, तुम्हारी गरीबी, शोषण का कारण भारत की सरकार है, इस स्थिति में मनोवैज्ञानिक बदलाव हुआ है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि 'मेरा उत्तर पूर्व अब शायद देश के विकास का नेतृत्व करेगा। भाजपा और मोदी सरकार के विकास के संकल्प पर विश्वास करके त्रिपुरा की जनजातीय क्षेत्र की बीस सीटों पर भाजपा की जीत दर्ज हुई है। यही स्थिति नागालैण्ड मेघालय की रही। जिन जनजातीय के लोगों को भाजपा विरोधी अपना एकाधिकार मानते थे, वे जनजाती के लोग आज राष्ट्रवादी विचार से प्रेरित है। सबसे महत्व की स्थिति यह है कि उत्तर पूर्व और भारत के अन्य क्षेत्र के बीच आत्मीयता, सहयोग, सुदृढ़ हुआ है।
 केवल राजनैतिक बदलाव से उत्तर पूर्व कान या स्वरूप दिखाई दे रहा है। कथा में कहा जाता है जब महाबली हनुमान चलते थे तो उनकी जंघा के घर्षन से प्रचंड हवा चलती थी, आसपास के वृक्ष उखडऩे लगते थे, पशु पक्षी अपने बचाव में इधर उधर भागने लगते थे। यही स्थिति राजनैतिक बदलाव के कारण हुई है, नये अरूणोदय के साथ ही केशरिया किरणों से लोगां में नई उमंग, उत्साह का वातावरण निर्मित हुआ है। अब उत्तर पूर्व के तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें बन गई हैं। उस समय लोगों को आश्चर्य हुआ, जब त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार और वर्तमान युवा मुख्यमंत्री विप्लव देव हाथ उठाकर मंच से उन लोगों का हाथ उठाकर अभिवादन कर रहे थे, जो भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। 
    पहले लाल सलाम था, अब भारत माता की जय की गूंज है, यही है राष्ट्रवादी विचार की विजय। यदि भारत का मानचित्र सामने रखकर विचार करे तो कांग्रेस और कम्युनिस्ट मुक्त भारत होने की निर्णायक स्थिति में है। उत्तर पूर्व में केवल मिजोरम के अलावा सभी राज्यों में राष्ट्रवाद की विजयी पताका फहरा रही है। राष्ट्रीय विचारों को शिक्षा क्षेत्र में गूंजित करने वाली विद्यार्थी परिषद के छात्र जब केरल हो या गोहाटी, अपना देश अपनी माटी का भाव, इस नारे से व्यक्त करते है तो देश के प्रति एकात्मता, आत्मीयता की भाव तरंगे उभरती है। इसी तरह उत्तर पूर्व में भी अब अपना देश अपनी माटी के विचार प्रवाह से लोग अभिभूत है। इस क्षेत्र में राष्ट्रीय विचार और विकास के अरूणोदय से देशभक्त मन प्रफुल्लित है। सारे भारत के लिए यह शुभ-मंगलकारी है। 

(लेखक - वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)
 

                                                                                                                                                      जयकृष्ण गौड़

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