जम्मू-कश्मीर सरकार के वित्त मंत्री हसीब द्राबू ने अपने वक्तव्य से महत्वपूर्ण विमर्श खड़ा किया है। जम्मू-कश्मीर में जो अशांति है, उसके वास्तविक कारणों की ओर उन्होंने इशारा किया है। किंतु, मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को जम्मू-कश्मीर की समस्या का कड़वा सच पचा नहीं और उन्होंने अपने ही कद्दावर मंत्री द्राबू को मंत्रिमंडल से निष्कासित करने का निर्णय कर लिया। चूँकि पीडीपी की नजर में जम्मू-कश्मीर की समस्या राजनीतिक है। ऐसे में पीडीपी के वरिष्ठ नेता हसीब द्राबू का यह कहना कि जम्मू-कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक है, कहीं न कहीं पीडीपी को असहज कर गया। द्राबू ने जब जम्मू-कश्मीर की अशांति का सच सामने रखा, तब सिर्फ पीडीपी ही नहीं अपितु अलगाववादी ताकतों का भी पेट दु:खा है। यकीनन सच सामने आने से जम्मू-कश्मीर को अशांत रखकर जो लोग राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं और बाहर से आ रहे धन से अपनी दुकान चला रहे हैं, उनको सबसे अधिक दिक्कत है। यदि यह सच स्वीकार कर लिया जाए कि जम्मू-कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक है, तब उसका समाधान सामाजिक बदलाव के माध्यम से खोजा जाएगा। ऐसे में स्वाभाविक ही कई लोगों की राजनीतिक दुकानें बंद हो जाएंगी। दिल्ली में एक संगोष्ठी में द्राबू ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा है कि उनके राज्य को संघर्षग्रस्त प्रदेश या राजनीतिक समस्या के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक मुद्दों वाले एक समाज के रूप में देखा जाना चाहिए। लोगों को राज्य की स्थिति की शुरुआत और प्रवृति के बारे में आत्मचिंतन करना चाहिए और विचार करना चाहिए कि इसका हल कैसे हो सकता है। उन्होंने कहा कि हमें दूसरे से बातचीत करने से पहले अपनेआप से बात करने की आवश्यकता है और यह राष्ट्रीय स्तर पर भी होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हम एक ऐसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, जिससे कई अन्य देश भी गुजर रहे हैं। द्राबू जो कह रहे हैं, उस पर गंभीरता और ईमानदारी से चिंतन करने की आवश्यकता है। उनके उठाए विमर्श को देशव्यापी बनाना चाहिए। पिछले ७० साल में हमने जम्मू-कश्मीर की समस्या को राजनीतिक ढंग से लेकर देख लिया, किंतु कोई समाधान नहीं निकला। क्या यह विचारणीय नहीं कि अब हमें समस्या को देखने का नजरिया बदलना चाहिए? देश का सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि जम्मू-कश्मीर में जो हिंसा होती है, उसके पीछे सामाजिक और सांप्रदायिक कारण है। द्राबू और अधिक खुलकर बोले होते तो कह पाते कि जम्मू-कश्मीर की समस्या वास्तव में मजहबी है। मजहबी उन्मादी वहाँ के नागरिकों को भड़काते हैं। इसके लिए उन्हें सीमापार से काफी धन भी आता है। अलगाववादी नेता वहाँ के लोगों को मुख्यधारा से नहीं जुडऩे देते। क्योंकि, उन्हें पता है कि यदि जम्मू-कश्मीर के लोग पढ़-लिख गए, रोजगार पा गए और मुख्यधारा में शामिल हो गए तो उनके बहकाबे में नहीं आएंगे। बहरहाल, जो लोग जम्मू-कश्मीर को राजनीतिक समस्या मानते हैं, उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि यह समस्या कैसे और किस अर्थ में राजनीतिक है? निश्चित जानिये कि इस प्रश्न पर तर्क नहीं, कुतर्क ही आएंगे। क्योंकि, झूठ को सिद्ध करने के लिए कुतर्कों का ही सहारा लिया जाता है। बहरहाल, इस मसले पर जम्मू-कश्मीर की सरकार में बराबर की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। द्राबू ने जो बात कही है, वह भाजपा की विचारधारा के नजदीक है। भाजपा भी जम्मू-कश्मीर की समस्या को राजनीतिक नहीं मानती है। वैसे तो द्राबू को मंत्रिमंडल में रखना या हटाना मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती एवं उनकी पार्टी का निर्णय एवं आतंरिक मामला है। फिर भी भाजपा को द्राबू के साथ खड़ा होना चाहिए। 

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