प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई अवसरों पर जनप्रतिनिधियों को उनकी भूमिका याद दिलाते रहते हैं। उनके कर्तव्यों को रेखांकित करते हैं। प्रधानमंत्री जनप्रतिनिधियों को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर जनता से संवाद एवं विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की नसीहत देते रहते हैं। उनके कहे का कितने जनप्रतिनिधि अनुसरण करते हैं, यह अलग बात है। क्योंकि, यदि उनके संदेश से सीख लेकर सभी जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास कार्यों को आगे बढ़ाएं तो तस्वीर कुछ और ही नजर आएगी। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर से राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि सम्मेलन में जनप्रतिनिधियों को चेताने का प्रयास किया है। यह समझने की जरूरत आज उन्हीं जनप्रतिनिधियों की महत्व है, जो राजनीति से इतर जनता के हितों के लिए काम करते हैं। लेकिन अभी भी एक बड़ी संख्या में ऐसे सांसद-विधायक हैं, जो अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास को पहली प्राथमिकता देने के बजाय जोड़-तोड़ की राजनीति में समय जाया करते हैं। ऐसे सांसदों और विधायकों को चेतना होगा और अगर वे नहीं चेतते तो जनता को उन्हें सबक सिखाने के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि यह देखने में आ रहा है कि कई सांसद-विधायक इसमें दिलचस्पी नहीं लेते कि उनके इलाके में विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों पर अमल सही तरह हो रहा है या नहीं? इस मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आदर्श ग्राम योजना में रुचि दिखाने वाले सांसदों की संख्या गिनती की ही है। हैरत यह है कि भाजपा के भी तमाम सांसदों ने इस योजना में दिलचस्पी दिखाने से इनकार किया। ऐसी स्थिति क्यों बनी, इस पर सरकार के साथ-साथ पक्ष-विपक्ष के राजनीतिक दलों को भी विचार करना चाहिए। यह जन प्रतिनिधियों का प्राथमिक दायित्व होना चाहिए कि वे अपने क्षेत्र में विकास कार्यों की गति-प्रगति पर निगाह रखें। इसके लिए किसी तंत्र की आवश्यकता हो तो उसका भी निर्माण किया जाना चाहिए, क्योंकि विकास के कामों को केवल नौकरशाही के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सच तो यह है कि विकास के कामों में जनप्रतिनिधियों के साथ आम जनता की भी भागीदारी होनी चाहिए। हालांकि प्रधानमंत्री ने विकास की प्रक्रिया में जनसहभागिता का उल्लेख किया, लेकिन तथ्य यह है कि सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों में जनता की भागीदारी को बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया जाना शेष है। एक ऐसे समय जब अन्य देशों में जनभागीदारी की दिशा में उल्लेखनीय पहल हो रही हैं तब इसका कोई औचित्य नहीं कि भारत केवल इस पर गर्व करता रहे कि वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। बड़े लोकतंत्र को बेहतर बनाने की जरूरत है और यह काम तब हो सकेगा जब विकास के कामों में जनता की भागीदारी सचमुच बढ़ेगी। राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि सम्मेलन के आयोजन की पहल लोकसभा अध्यक्ष सुमित्र महाजन ने इस मकसद से की ताकि सांसद और विधायक विकास के कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकें। बेहतर हो कि इस सम्मेलन के जरिये शासन और प्रशासन न केवल इससे अवगत हो कि विकास के कामों को गति देने में सांसदों और विधायकों को किस तरह की समस्याएं आड़े आती हैं, बल्कि इन समस्याओं को दूर करने के प्रयास भी किए जाएं। 

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