देवेंद्र फडणवीस भी इस बात को समझ चुके हैं कि योगी आदित्यनाथ के रास्ते पर चलते हुए वो फंस चुके हैं जहां से उनका निकलना काफी मुश्किल है|

अगर आप ध्यान से महाराष्ट्र के किसानों के कर्जमाफी के मुद्दे को देखेंगे तो आपको इस समस्या में बुरी तरह से उलझ चुके वहां के 47 वर्षीय युवा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो जाएगी. फडणवीस शुरु में कर्जमाफी के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने किसानों के इस मसले को सुलझाने के लिए दूसरे उपायों पर भी विचार किया था.

फडणवीस ने अप्रैल 2017 में आधिकारिक रुप से कहा था कि कर्ज माफी से किसानों को पूरी तरह से ऋण मुक्त नहीं किया जा सकता है हां, अगर इसकी जगह कृषि क्षेत्र में ज्यादा निवेश किया जाए, किसानों को सिंचाई के लिए पानी और बिजली की सप्लाई लंबे समय तक सुनिश्चित की जाए तो इससे छोटे और मझोले किसानों को आर्थिक रुप से लंबे समय तक के लिए मजबूत बनाया जा सकता है.

उसी कार्यक्रम में किसानों के बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि “मी मुख्यमंत्री बोलतेय” यानि मै मुख्यमंत्री बोल रहा हूं और आप समझ लीजिए कि कोई भी फसल के लिए गए कर्ज की माफी इस समस्या का आखिरी समाधान नहीं है. इससे किसानों को पुराने कर्ज से तो माफी मिल जाएगी लेकिन इससे किसानों को अगले फसल के लिए गए कर्ज को चुकाने की आर्थिक हैसियत कैसे पैदा होगी. फडणवीस ने उस समय आगे कहा कि एक बार के फसल कर्ज माफी से उन्हें राजनीतिक लाभ तो मिलेगा लेकिन किसानों को इससे ज्यादा लाभ नहीं मिलेगा, जबकि उनकी सरकार चाहती है किसानों के सिर पर से कर्ज की समस्या ही उतर जाए.

अपने बयान पर कायम नहीं रह पाए फडणवीस

फडणवीस के बयान के बाद बहुत से लोगों, जिसमें इस लेख का लेखक भी शामिल है, ने आशंका जताई थी कि क्या फडणवीस अपने बयान पर आगे भी कायम रह पाएंगे या नहीं? ऐसा इसलिए था क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद यूपी के नए सीएम योगी आदित्यनाथ ने पीएम मोदी के यूपी चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादे के मुताबिक किसानों के 36 हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफी की घोषणा कर दी थी जिसके बाद महाराष्ट्र में सीएम फडणवीस पर राजनीतिक और किसान संगठनों की ओर से कर्ज माफी के लिए चौतरफा दबाव बढ़ने लगा था.

बाद में कर्ज माफी की मांग ने जोर पकड़ लिया और न केवल महाराष्ट्र बल्कि मध्य प्रदेश में भी किसानों ने जोरदार आंदोलन छेड़ दिया. तार्किक रुप से महाराष्ट्र में फडणवीस अपनी बात पर कायम नहीं रह सके. उनके द्वारा कर्ज माफी के खतरों के प्रति आगाह किए जाने के बाद भी किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगी और मजबूरन फडणवीस को यूपी के सीएम योगी के रास्ते पर चलने को बाध्य होना पड़ा और उन्होंने भी किसानों के 34 हजार करोड़ रुपए फसल कर्ज को माफ करने की घोषणा करनी पड़ी. लेकिन अफसोस की बात ये रही कि इस घोषणा के बाद भी किसानों की नाराजगी दूर नहीं हुई और आज भी उनका आंदोलन जारी है.

योगी के रास्ते पर चल फंसे फडणवीस

यूपी में किसानों की कर्ज माफी भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति थी जिसे पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान जमकर प्रसार किया और बाद में ये पार्टी के लिए यूपी में ये सत्ता की चाबी भी साबित हुआ. लेकिन यूपी की कर्ज माफी ने न केवल यूपी बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत कई अन्य राज्यों पर भी असर दिखाना शुरु कर दिया. फडणवीस जैसे साहसी मुख्यमंत्री जिसने पार्टी लाइन से हटकर कर्ज माफी के विरोध में बयान दिया उन्हें भी यूपी कर्ज माफी की घटना ने झुकने पर मजबूर कर दिया और मजबूरन उन्होंने अपने राज्य में कर्ज माफी का आदेश दे दिया. राजनीतिक विश्लेषकों को योगी की कर्ज माफी के बाद इसकी आशंका हो चुकी थी. लेकिन इस आदेश ने अधिकतर कृषि आधारित प्रदेशों को चौंका रखा है क्योंकि ऐसे राज्य पहले से ही आर्थिक रुप से ज्यादा मजबूत नहीं है. यहां तक कि कर्ज माफी की घोषणा के बाद भी महाराष्ट्र सरकार इसको लागू करने के लिए संघर्ष कर रही है.

अभी सीएम फडणवीस के सामने ‘आगे कुआं पीछे खाई’ वाली स्थिति बनी हुई है. मुख्यमंत्री कार्यालय से कुछ ही दूरी पर किसानों का विशाल प्रदर्शन चल रहा है जो कि पूरी तरह से फसल कर्ज और बिजली के बिल को माफ करने की मांग कर रहे हैं. अगर फडणवीस किसानों की ये मांग स्वीकार कर लेते हैं तो फिर राज्य सरकार को पहले से ही जर्जर अर्थव्यवस्था से कुछ और इतंजाम करना पड़ेगा क्योंकि 34 हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफी की घोषणा से पहले से ही सरकार पर 20 हजार करोड़ की कमी को पूरा करने का दबाव मौजूद है.

लेकिन इनकार करके भी फंसेंगे सीएम

इसके अलावा फडणवीस एक ऐसी स्थिति को जन्म देने का रिस्क ले रहे हैं जिसमें फिर से बारिश की कमी की वजह से किसानों का कर्ज माफ करना पड़ सकता है. अगर ऐसा दोबारा होता है तो सरकार की पहले से वित्तीय जर्जर हालत और ध्वस्त हो जाएगी. लेकिन अगर फडणवीस ने किसानों की मांगों के आगे झुकने से इंकार कर दिया तो फिर क्या होगा? फडणवीस के लिए ये राजनीतिक रूप से असहज होने वाली स्थिति बन जाएगी. पार्टी को इसका बड़ा खामियाजा आगे के चुनावों में उठाना पड़ सकता है क्योंकि राज्य में किसान एक बड़ा वोट बैंक हैं. ऐसे में फडणवीस के लिए इस विकल्प का चुनाव भी मुश्किल होगा.

किसानों की मांगों पर विचार करने के लिए 6 सदस्यीय समिति का गठन मामले को टाले जाने की योजना हो सकती है. यूपी में योगी आदित्यनाथ की किसानों के लिए फसल कर्ज माफी की घोषणा के बाद महाराष्ट्र में भी पिछले साल जून में किसानों के लिए 34 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफी की घोषणा कर दी गई. लेकिन इतने महीने बीत जाने के बाद भी अभी तक लगभग केवल 13,580 करोड़ रुपए की राशि ही लाभ लेने वाले किसानों के खाते में पहुंच सकी है.

इसके बाद अभी तक इस सवाल का भी जवाब नहीं मिला है कि आखिरकार इस योजना का लाभ लेने वाले किसान कौन-कौन हैं? इस योजना की शुरुआत में ही गड़बड़झाला हो गया जिससे वास्तविक किसानों तक योजना का लाभ अभी तक पहुंच ही नहीं पाया है और यही वजह है कि महाराष्ट्र के कोने-कोने से किसान पूर्ण कर्ज माफी और फसलों के नुकसान पर सहयोग की मांग को लेकर मुंबई में बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए हैं.

खराब आर्थिक स्थिति में राजनितिक हालत भी खतरे में

फडणवीस राज्य की बिगड़ती आर्थिक सेहत को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. 2017-18 का महाराष्ट्र का आर्थिक सर्वे राज्य की बदहाल आर्थिक स्थिति की तस्वीर पेश कर रहा है. वर्ष 2017-18 में राज्य की विकास दर घट कर 7.3 फीसदी रह गई है. ये फडणवीस सरकार के तीन सालों के सत्ता में रहने के दौरान सबसे कम विकास दर है. पिछले वित्तीय वर्ष में महाराष्ट्र में विकास दर 10 फीसदी रिकार्ड की गयी थी.

वर्ष 2015-16 में भी राज्य की विकास दर 7.6 फीसदी थी. किसानों की कर्ज माफी योजना के लिए 20 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त इंतजाम करने की वजह से राजकोषीय व्यय जबरदस्त तरीके से बढ़ गया है. इससे साल के शुरू में अनुमानित राजस्व घाटा 4,511 करोड़ और राजकोषीय घाटा के 38,789 करोड़ से कहीं ज्यादा होने की आशंका है. राज्य को सबसे बड़ा झटका लगा है कृषि क्षेत्र से जो कि राज्य की लगभग आधी आबादी से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है. यहां पर सर्वे के मुताबिक अनुमानित तौर पर वर्ष 2017-18 में इस क्षेत्र का विकास घट कर 8.3 फीसदी हो गया है. पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य में विकास दर 10 फीसदी थी जिसमें सबसे बड़ा योगदान कृषि क्षेत्र और उससे जुड़ी गतिविधियों का ही था जिनमें 22.5 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया था. हालांकि इसके पीछे अच्छे मानसून का ज्यादा योगदान था.

इस लेख का लेखक पहले से ये जोर देता रहा है कि किसानों की फसल कर्ज माफी का कर्ज वापस करने की संस्कृति पर गहरा और बुरा असर पड़ रहा है. पूर्व के अनुभव भी हमें कुछ इसी तरह की सीख देते हैं. यूपीए-1 के 2008 में किसानों की कर्ज माफी एक शानदार केस स्टडी के रुप में मौजूद है. इसमें कोई दो राय नहीं कि ये तात्कालिक रुप से राजनेताओं और किसानों को जबरदस्त फायदा पहुंचाते हैं लेकिन ये सब केवल अस्थायी होता है. जब वही किसान दूसरी बार कर्ज लेने के लिए बैंक मैनेजर के पास पहुंचता है तो पहली बार में कर्ज माफ कर चुका वही मैनेजर उसे कर्ज देने से पहले कई बार सोचता है क्योंकि उस किसान की लोन चुकाने की क्षमता सवालों के घेरे में आ चुकी होती है. इतना ही नहीं बैंकों को भी कर्ज माफी से काफी नुकसान होता है.

राजनीतिक प्रबंधन जिसने कर्ज माफी की अनुशंसा कर दी है वो बैंकों को उसके नुकसान की भरपाई समय पर नहीं करता है नतीजा बैंकों के बैलेंसशीट पर बोझ पड़ता है और उनकी आर्थिक हालत कमजोर होती जाती है. वो बैंक जो कि किसानों और कृषि गतिविधि से जुड़े लोगों को लोन देते हैं उनके पास नॉन परफार्मिंग एसेट्स या बैड लोन्स के बढ़ने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है. संक्षेप में कह सकते हैं कि कर्ज माफी वो जहर है जो कि पूरे शरीर के विभिन्न अंगों को एक ही बार में नुकसान पहुंचा सकता है.

लेकिन कर्ज माफी के दुर्गुणों पर अब कोई भी चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अब ये एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. जो भी राजनीतिज्ञ इसके खिलाफ बोलने का साहस जुटाएगा वो उसके लिए राजनीतिक आत्महत्या के समान हो जाएगा. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी इस बात को समझ चुके हैं कि योगी आदित्यनाथ के रास्ते पर चलते हुए वो फंस चुके हैं जहां से उनका निकलना काफी मुश्किल है.

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