16 दिनों तक चलने वाला गणगौर पर्व 2 मार्च से शुरू हो चुका है. 20 मार्च को गणगौर का आखरी दिन है. ये त्योहार चैत्र शुक्ल की तृतीया को मनाया जाता है. इस दिन महिलाएं शिव-गौरी की पूजा कर दोपहर तक व्रत रखती हैं. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने पार्वतीजी को और पार्वतीजी ने पूरे स्त्री-समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था. यह त्यौहार ज्यादातर राजस्थान में मनाया जाता है. इसके अलावा ये त्यौहार गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के कुछ भागों में भी मनाया जाता है.

क्या है गणगौर का महत्व?

गणगौर की पूजा कुंवारी महिलाओं से लेकर विवाहित स्त्रियों तक हर कोई कर सकता है. कुंवारी लड़कियां यह व्रत अच्छा वर पाने के लिए करती हैं तो वहीं विवाहित स्त्रियां ये व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं. विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार कर सोलह दिन पूरे विधि-विधान से पूजा करती हैं.

पूजा विधि

16 दिनों तक चलने वाली गणगौर पूजा होलिका दहन के बाद वाले दिन से शुरू होती है. सबसे पहले चौकी लगाकर, उस पर स्वास्तिक बनाकर पानी से भरा कलश रखा जाता है. इसके बाद उस पर नारियल और पान के पांच पत्ते रखे जाते हैं. ये कलश चौकी की दाहिनी ओर रखा जाता है.

इसके बाद होली की राख या काली मिट्टी से सोलह छोटी-छोटी पिंडी बनाकर उसे चौकी पर रखा जाता है. इसके बाद गणगौर के गीत गाए जाते हैं. ऐसी पूजा शुरू के सात दिन करने के बाद सातवें दिन शाम को कुम्हार के यहां से गणगौर भगवान और मिट्टी के दो कुंडे लाए जाते हैं. गणगौर के आखिरी दिन तक इनकी विधि विधान से पूजा कर गणगौर भगवान को विसर्जित कर दिया जाता है और गणगौर का उद्यापन किया जाता है.

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