देश में अचानक मूर्तियों को खंडित करने का सिलसिला चल पड़ा। यह त्रिपुरा से शुरु हुआ और मात्र तीन दिनों में ही सुदूर दक्षिण तक जा पहुंचा। ऐसा कोई विचार नहीं, कोई आयाम नहीं जिसकी प्रतीक मूर्तियां खंडित न की गई हो। इसमें लेनिन, दीनदयाल उपाध्याय, रामास्वामी पेरियार और डॉ. अंबेडकर किसी विचार या सामाजिक संघर्ष से सरोकार रखते हैं तो आस्था के प्रतीक हनुमानजी तक को घेरे में ले लिया गया। यह है हमलों के पहले दौर की झलक और बाद के दिनों में क्या क्या हुआ यह सब भी बहुत विवरण सहित अखबारों में आ चुका है। अब सवाल यह है कि यह सब अचानक हुआ या फिर इसकी योजना वर्षों से बनाई जाती रही? और यदि योजना पूर्वक काम हो रहा है तो इसके पीछे कौन हो सकता है?
यह सब आकस्मिक नहीं है, तत्काल उत्तेजना की प्रतिक्रिया भी नहीं है। इसकी रचना वर्षों से की जाती रही है। हर मिट्टी की अपनी विशेषता होती है। और उसमें भारत की मिट्टी ऐसी है कि यहां दुनिया की हर विचार धारा, हर मान्यता, हर आस्था, हर विश्वास और हर धर्म खूब फलता फूलता है। जिसे कहीं जगह न मिले वह भारत को अपना ठिकाना बना सकता है।  यह हम न केवल इंसानी नस्लों और दुनिया के धर्म-साम्प्रदाय को भी देख सकते हैं। लेकिन साम्यवादी विचार को सदैव यह कौतूहल रही कि उसका विचार उतना क्यों न पनप पाया जितना उसे उम्मीद थी या भारत की मिट्टी में उर्वरक क्षमता थी इसके लिए उन्होंने बहुत कोशिश की। बिहार, बंगाल, केरल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि अनेक प्रांतों लेकिन उनकी जड़ें केवल बंगाल में जम सकीं। पश्चिम बंगाल की सरकार जाते ही उनकी चिंता बढऩा स्वाभाविक थी। चूंकि साम्यवाद की अपनी एक शैली है। वह अपनी शुरुआत संघर्ष से करती है। वह संघर्ष वैचारिक हो अथवा खूनी। उसके विस्तार में यह दोनों आयाम उसके आधार होते है। इसके लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते है।
साम्यवाद की एक दूसरी शैली है वह यह कि वह जहां कहीं जाती है वह स्थानीय मान्यताओं और संस्कृति में बदलाव लाना शुरु करती है। ऐसा रूस में भी किया, चीन में भी किया, बर्लिन, पूर्वी जर्मनी और जहां कहीं वे गए। ऐसा बदलाव किया गया। ऐसा वे न केवल सार्वजनिक तौर पर करते हैं बल्कि इतिहास और संस्कृति की पुस्तकों में भी करते हैं। यदि हम भारत का ही उदाहरण देखें तो इतिहास और संस्कृति के जितने लेखक वामपंथ से प्रभावित हैं उनके लेखन और अन्य लेखकों के लेखन में जमीन असामानता  का अंतर मिलेगा। यदि किसी इतिहास के पात्र पर एकमत हो तो उनके प्रस्तुतिकरण में अंतर होता है। इसीलिए दुनियाभर के साम्यवादियों को वे विचारक और वे राजनीतिक पसंद नहीं आते जो अपने राष्ट्रों की जमीन की बात करते हैं। भारत में मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोध का सबसे बड़ा कारण यही है। यहां एक बात और ध्यान रखने की है कि जिन दिनों साम्यवादियों को लगता था कि भारत में कांग्रेस की सत्ता अखंड है तो उसे खंडित करने के लिए उन्होंने जनसंघ जो भाजपा की तुलना में संघ के ज्यादा करीब था का समर्थन करने लगे थे। इसका उदाहरण प्रदेशों की संविद सरकारें और 1989 में दिल्ली की विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार थी जिसमें भाजपा भागीदार थी और उस सरकार को साम्यवादियों का समर्थन था। यही आशंका अब साम्यवादियों को मोदी सरकार के प्रति हो गई। इसलिए इस सरकार को वे अराजकता से कमजोर करना चाहते है और इसके लिए वे कांग्रेस के कैंप में बैठ गए।
देश में अराजकता फैलाने का संकेत हमें दिल्ली में जे.एन.यू. की घटना से मिल गया था। जब आतंकवादी और संसद पर हमले पर फांसी की सजा पाए अफजल के समर्थन में नारे लगे थे और भारत के टुकड़े करने की बात कही गई थी। यह बात दुनिया मानती हैं कि साम्यवाद का किसी भी धर्म से कोई लेना देना नहीं। साम्यवाद धर्म को अफीम मानता है फिर भी भारत के टुकड़े करने वाले नारे के साथ 'इंशा अल्लाहÓ जोड़ा गया और अफजल को हीरो बनाने की कोशिश की गई थी। आशंका थी कि इस तरह के नारे के बाद भारत में संघर्ष होगा। वे तीली लगाकर अलग हो गए यह षडय़त्र था भारत के हिंदुओं  और मुसलमानों में संघर्ष कराने का। इसीलिए देशद्रोही की तस्वीर के साथ 'अल्लाहÓ शब्द जोड़ा गया। लेकिन हिंदू और मुसलमान तटस्थ रहे। वामपंथियों की बात नहीं बनी। यह केवल उसी तरह का षडय़त्र हैं जैसा साम्यवाद भारत में अब तक करता आया है। साम्यवाद ने भारत में अपनी जड़ें जमाने के लिए पहले अंग्रेजों का साथ लिया। 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में वे अंग्रेजों के साथ थे। फिर वे कांग्रेस का समर्थन करने लगे और चीन से पर्याप्त पैसा मिले इसके लिए 1962 के भारत चीन युद्ध में भारत के तमाम माक्र्सवादियों ने भारत के स्टैण्ड का समर्थन नहीं किया बल्कि चीन का किया। आज हम इतिहास के पन्ने पलटकर देख लें। इसके बाद ही भारत में हिंसक घटनाएं बढ़ी, नक्सलवाद की शुरुआत हुई और पूर्वोत्तर के तमाम प्रांतों में अराजकता और वामपंथियों की ताकत भी बढ़ी।
अब साम्यवादियों को लगता है कि भाजपा की जड़ें कमजोर करने के लिए यदि राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस का साथ लिया जाए और भारत में हिंसा फैलाने के लिए मुस्लिम आतंकवादियों का इसीलिए वे अफजल की तस्वीर लेकर घूमने लगे।  दूसरी ओर वे हिंदु समाज में वर्ण संघर्ष  की स्थिति लाना चाहते हैं इसके लिए पहले उन्होंने एक नौजवान बैमूला का साथ लिया। जिग्रेश और कन्हैया को बरगलाकर तैयार किया। इसकी शुरुआत को आगे बढ़ाने के लिए यह ताजा मूर्ति खंडन कार्य आरंभ हुआ। हालांकि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोडऩे की घटनाएं अभी जांच के दायरे में है। जांच के बाद ही परिणाम आयेंगे। लेकिन इस बात की पक्की संभावना है कि देश में मूर्ति तोडऩे का सिलसिला वामपंथियों ने देश में हिंसा फैलाने के लिए स्वयं किया। इस तरह का यह प्रयास पहला नहीं है और भी हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल में एक नन से बलात्कार की घटना  में सभी आरोपी बंगलादेशी निकले। बिल्कुल इसी प्रकार दक्षिण की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के आरोपी सामने आए। लगभग 18-बीस साल पहले देश में अचानक पवित्र पुस्तक कुरान के पन्ने जलाने की घटनाएं हुई दिल्ली और लखनऊ में ये जो आरोपी रंगे हाथ पकड़े गए वे बंगलादेशी निकले। वह भी षडय़त्र बेनकाब हुआ था।
अब ताजा संघर्ष में वैचारिक तनाव को बहुत चालाकी से जातीय और धार्मिक तनाव में बदला जा रहा है। पहले लेनिन की प्रतिमा टूटी, फिर पंडित दीनदयाल की, फिर  डॉ. अबेडकर की फिर पेरियार की और फिर हनुमानजी की। इस क्रम में साफ दिखता है कि तनाव में डुबाने के लिए लोगों को उत्तेजक करके सड़क पर लाने की योजना में सबको जोड़ा गया ताकि किसी को सोचने समझने का मौका न मिले। उन्हें इससे मतलब नहीं कि मरता कौन है, वे केवल अपनी जड़ें जमाना चाहते हैं। हिंसा और अराजकता फैलाकर जैसा उन्होंने दुनियाभर में किया है।

                                                                                                                                                                    रमेश शर्मा

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