अमेरिका से आए दिन लताड़ मिल रही है. आतंकवाद को आर्थिक मदद देने वाले देशों की सूची में नाम आने की तलवार सिर पर लटकी है. आतंकवादियों की पनाह के तौर पर दुनिया भर में बदनाम हैं. रोजी रोटी के लिए नौजवान देश छोड़ कर भाग रहे हैं. लेकिन हुक्मरान मुसलमान दुनिया का नेता बनने का ख्वाब संजो रहे हैं. जी, बात पाकिस्तान की ही हो रही है, जिसके विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ का संसद में दिया बयान इन दिनों वहां के मीडिया में छाया है.

मंत्री महोदय ने कुछ अपने भी गिरेबान में झांका है, लेकिन इससे ज्यादा आईना मुस्लिम दुनिया को दिखाया है. उन्होंने यह भी कहा है कि अफगानिस्तान में अमन कायम करने में अमेरिका की कोई दिलचस्पी नहीं है. ऐसे में कुछ अखबार पूछ रहे हैं कि आपकी आंखें अब खुली हैं?

ऊंचे सपने

‘जंग’ ने ख्वाजा आसिफ का बयान छापा है, 'हमने रूस के खिलाफ मेड इन अमेरिका जिहाद किया, 9/11 के बाद फिर गलती दोहराई, जिसका खमियाजा भुगत रहे हैं. मरवाता कोई और है और खंजर हमारे हाथ में होता है... अब हम अमेरिकी प्रॉक्सी नहीं बनेंगे. मुसलमान देशों के हुकमरान दुश्मन के मददगार बन गए हैं. मुस्लिम दुनिया को किसी और दुश्मन की जरूरत नहीं है. हमें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है कि दुनिया का हर मुसलमान चाहता है कि पाकिस्तान आकर हमें बचाए.'

यानी सपनों की उड़ान ऊंची है. लेकिन पाकिस्तानी विदेश मंत्री यह बताना भूल गए कि 'मेड इन अमेरिका' जिहाद और आतंकवाद के खिलाफ जंग के एवज में पाकिस्तान ने अमेरिका से अरबों खरबों डॉलर वसूले हैं. बहरहाल ‘जंग’ लिखता है कि अपनी गलती मान ली जाए तो न सिर्फ उसे सुधारा जा सकता है बल्कि दोबारा गलती करने से बचा जा सकता है. अखबार कहता है कि यह अकल पहले आ जाती तो आज यह दिन ना देखना पड़ता. लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक पाकिस्तान जिस दोधारी तलवार पर चलता आया है, उसका नतीजा और हो भी क्या सकता है?

‘मशरिक’ लिखता है कि विदेश मंत्री ने बिल्कुल ठीक कहा है कि सीरिया और इराक के बाद अगला निशाना पाकिस्तान है. अखबार कहता है कि आज शायद ही कोई ऐसा मुस्लिम देश है जो किसी अन्य मुस्लिम देश के साथ वास्तविक रूप से मुस्लिम भाईचारे की भावना के मुताबिक करीबी रिश्ते रखता हो. अखबार सीरिया के संकट का जिक्र करते हुए उसके पड़ोसी देशों को आपस में बांटने का इल्जाम पश्चिमी देशों के सिर पर रखता है. लेकिन अखबार को शायद पता नहीं है कि सीरिया संकट तो चंद साल से चल रहा है, लेकिन सऊदी अरब के नेतृत्व में सुन्नी अरब देश और शिया ईरान तो दशकों से एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते.

'अब तक क्या किया?'

पाकिस्तान में सरकार विरोधी तेवरों के लिए मशहूर ‘जसारत’ अखबार लिखता है कि परवेज मुशर्रफ ने पूरा देश ही अमेरिका के हवाले कर दिया था और सिर्फ एक टेलीफोन कॉल पर इस जांबाज आर्मी चीफ ने हथियार डाल दिए थे. अखबार ने ख्वाजा आसिफ को आड़े हाथ लेते हुए लिखा है कि 2013 से तो उनकी पार्टी की सरकार है, तो फिर उन्होंने क्या किया? क्या अमेरिका की तरफ से दी जा रही मदद और उसके बदले पाकिस्तान सरजमीन के इस्तेमाल में कोई बाधा डाली गई?

अखबार की टिप्पणी है कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने बेवफा महबूब की तरह आंखें फेर ली हैं, और न सिर्फ मदद रोक दी बल्कि धमकी भी दी है तो ख्वाजा आसिफ को ख्याल आया है कि अमेरिका को अफगानिस्तान में शांति कायम होने से कोई मतलब नहीं है. अखबार के संपादकीय की आखिरी लाइन है कि अमेरिका को बुरा भला कहने से बेहतर है कि खुद को मजबूत किया जाए, लेकिन क्या ऐसा हो सकेगा?

उधर ‘औसाफ’ संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी के इस बयान को तवज्जो देता है कि अफगानिस्तान या कोई और देश दबाव और धमकियों के जरिए पाकिस्तान का सहयोग हासिल नहीं कर सकता.

अखबार कहता है कि अफगानिस्तान में शांति कैसे कायम करनी है, यह अमेरिका, अफगानिस्तान और उसके सहयोगियों को सोचना है, क्योंकि पाकिस्तान अब अफगानिस्तान की जंग को अपने यहां नहीं लाना चाहता. इसके बाद अखबार उसी घिसी-पिटी दलील पर आ जाता है कि अमेरिका अफगानिस्तान की जंग हार रहा है और पाकिस्तान को बलि का बकरा बना रहा है. लेकिन इस बकरे ने डॉलर भी तो खूब चरे हैं.

प्रोपेगैंडा मुहिम

उधर ‘वक्त’ ने पाकिस्तान पर पड़ रहे दबाव को अफगानिस्तान की प्रोपेगैंडा मुहिम कहकर खारिज किया है. भारत को निशाना बनाते हुए अखबार कहता है कि अफगानिस्तान को अपने तथाकथित सहयोगियों के इरादों से सावधान रहना चाहिए क्योंकि भारत बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से पाकिस्तान को घेरना चाहता है. साथ ही अखबार अफगान हुकमरानों को अपना रवैया तब्दील करने की सलाह देता है. लेकिन साफ है कि आज पकिस्तान जिस तरह की मुश्किलों में घिरा है, उन्हें देखते हुए बदलने की ज्यादा जरूरत पाकिस्तान को है और वह भी पूरी ईमानदारी के साथ.

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