राजेश शुक्ला, कांकेर

बूढ़ी हुई मां, झुकी कमर

अब तो लौट आ।।

करना ना तू देर

सांसें चंद बाकी

अब तो लौट आ।।

पथरा गई हैं आंखें

इक नजर देखने को

अब तो लौटा आ...।।

ये किसी कवि की रचना नहीं वरन अपनी उस इकलौती औलाद से एक बुजुर्ग माता-पिता की लिखित फरियाद है जो आज से करीब 17 बरस पहले हाथों में बंदूक उठाए नक्सलवाद की अंधेरी दुनिया में कहीं गुम सा हो गया है।

जीवन की सांझ बेला में अपनी औलाद को एक भर नजर देख लेने की यह इच्छा अब इस कविता के रूप में छत्तीसगढ़ की सीमा पर गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) व आसपास के इलाकों में जगह-जगह पोस्टरों में नुमाया है। बुजुर्ग माता-पिता को पूरी उम्मीद है कि कोई तो उनका संदेश बेटे तक पहुंचा ही देगा, शासन-प्रशासन से भी उन्हें मदद की आस है। गंभीर रूप से बीमार बिस्तर पर पड़ी वृद्ध मां के कांपते ओंठों से बस एक वाक्य बार बार निकलता है- मेरा नीरू जरूर आएगा।

समाज की मुख्यधारा से भटके युवाओं के परिजनों पर क्या बीतती है, माता-पिता के बुजुर्ग हो जाने पर किस तरह उनकी जिंदगी मौत से भी बदतर हो जाती है, यह सधाी घटना इसका उदाहरण है। ओडिशा के रायगढ़ा जिला अंतर्गत कल्याण सिंहपुर ब्लॉक में रहने वाले बुजुर्ग नरहर राउत का 4 फरवरी को संभवत: दूसरे के हाथों उड़िया भाषा में लिखवाया गया यह कविता पत्र छत्तीसगढ़ की सीमा पर गढ़चिरौली के आसपास व चंद्रपुर में कई स्थानों पर चस्पा है। इसमें बेटे नीरू को लेकर मार्मिक अपील की गई है।

इस पोस्टर में उक्त मार्मिक कविता के समर्थन में नक्सलियों को संबोधित करते कुछ इस तरह के संदेश भी हैं ... 'युवावस्था में माओवादियों की गलत नीति को ग्रहण कर अपने माता-पिता, भाई-बहन, घर-परिवार और समाज को छोड़ दिशाहीन होकर वन जंगल में भटक रहे हर माओवादियों के माता-पिता, परिवार के सदस्य किस कठिन अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, यह माओवादी नहीं जान रहे हैं। माओवादी खुद मुख्यधारा से दूर हट गए लेकिन उनके माता-पिता इससे कितने दुखी हैं, कितना कष्ट सहकर समाज में रह रहे हैं, इसका वर्णन करना काफी कठिन है। उन्हीं माओवादियों के बीच से एक के माता-पिता जीवन की अंतिम अवस्था में दिन काट रहे हैं। अपने बेटे के वापस आने की राह देख रहे हैं'।

आंसुओं से भींगा एक खत ...औलाद के नाम

मेरे नीरू,

दूर से ही सही, मेरा और अपनी मां का आशीर्वाद लेना। भगवान जगन्नाथ की कृपा से तू जहां भी हो, अच्छे से हो, यही हमारी आशा है। पिछले 17 साल से हम तुम्हारे वापस आने की राह देख रहे हैं। अब भी हमें आशा है कि तू हमारे पास सुरक्षित वापस आएगा। सभी माता-पिता की इच्छा हाती है कि वृद्धावस्था में उसका बेटा साथ में हो। यही इच्छा हम दोनों पति-पत्नी की भी है। मुझे वह दिन कल जैसा ही लग रहा है, जब तुमने अपनी मां का अस्पताल में इलाज कराया था। तुम्हारे जाने के बाद से हमारी स्थिति बहुत खराब हो गई है। तुम्हें याद कर रो-रोकर हमारा बुरा हाल है। इसी वजह से तुम्हारी मां ने बिस्तर पकड़ लिया है। हमारा पूरा घर टूट गया है। पैसे खत्म हो गए हैं। झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। यदि तू झोपड़ी को देखेगा तो आंखों में आंसू आ जाएंगे। हमें आशा है कि तू वह रास्ता छोड़कर हमारे पास वापस आ जाएगा। हम तुम्हारे आने की राह देख रहे हैं। तू ही अपनी मां की आंखों से बहते आंसू पोंछ पाएगा। हमारा टूटा घर भी बना पाएगा। हमारी आशा को निराश मत करना।

तुम्हारे हताश और दुखी माता-पिता

नरहरि राउत व सरस्वती राउत

कौन है नीरू

जगदलपुर व ओडिशा में लंबे समय तक समाजसेवा कर चुके भारत भूषण बताते हैं कि नीरू के पहले मलकानगिरी और उसके बाद सुकमा व गढ़चिरौली क्षेत्र में परिवर्तित नाम से नक्सली संगठन में काम करने की सूचना है। पुलिस की सूची में वह वांटेड है। हालांकि पिछले तीन साल से उसकी कोई खबर नहीं है।

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