दो सीटों से शुरू हुआ भारतीय जनता पार्टी का सफर अब 21 राज्यों में सरकार बनाने तक जा पहुंचा है। भाजपा के विजयी अभियान को देखकर और उसे मिल रहे जनसमर्थन ने विभिन्न राजनीतिक दलों के सामने अस्तित्व का प्रश्न उत्पन्न कर दिया है। अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए कांग्रेस ही नहीं, अपितु क्षेत्रीय दलों में भी बेचैनी है। उसका परिणाम यह हो रहा है कि हमारे सामने ऐसे गठबंधन सामने आ रहे हैं, जिनकी कभी किसी राजनीतिक पंडित ने कल्पना भी नहीं की होगी। उत्तरप्रदेश में सपा और बसपा का साथ आना ऐसा ही है। गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में बीएसपी ने समाजवादी पार्टी को समर्थन देते हुए अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। साथ ही ऐलान किया कि वह समाजवादी पार्टी के विधान परिषद उम्मीदवार को भी अपना वोट देगी। जबकि बदले में समाजवादी पार्टी राज्यसभा चुनाव में बीएसपी उम्मीदवार को समर्थन देगी। बहरहाल, एक बार फिर देश में भाजपा के विरुद्ध साझे गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हालांकि, हमें यह भी समझना चाहिए कि अब तक भी ज्यादातर राजनीतिक दल भाजपा के विरोध में ही रहे हैं। इसके बावजूद भाजपा जनता के मन में अपनी जगह बनाने में कामयाब रही। क्षेत्रीय दल यह जान चुके हैं कि भाजपा की बढ़ती ताकत और चुनावी प्रबंधन से अपने बूते पर अकेले जीत पाना नामुमिकन है। यही वजह है कि क्षेत्रीय दल अलग-अलग तरीके से एक बड़े गठबंधन की जरूरत महसूस कर रहे हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के मुखिया के चंद्रशेखर राव ने कहा है कि देश में एक गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी मोर्चे की जरूरत है। साथ ही यह भी कहा वो गठबंधन की अगुवाई के लिए तैयार हैं और इस मुद्दे पर उनकी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात भी हो चुकी है। वहीं, कांग्रेस भी यह जानती है कि भाजपा को रोकने के लिए उसे विपक्षी दलों को साथ लाकर एक महागठबंधन तैयार करना होगा। पिछले साल कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष को लामबंद कर एक मोर्चा बनाने की कोशिश भी की थी। विपक्षी दलों के यह प्रयास बड़े स्तर पर सफल नहीं हो सके हैं। भविष्य में भी इसकी संभावना कम ही है कि भाजपा के विरुद्ध कोई भी 'महागठबंधनÓ बन पाएगा और बन भी गया तो अधिक दिन चल पाएगा। क्योंकि, इस महागठबंधन का नेतृत्व प्रत्येक पार्टी करना चाहती है। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 'सबका साथ-सबका विकासÓ के नारे को पार्टी के लिए ब्रांड बना चुके हैं, जिसका विपक्ष के पास तोड़ नहीं दिख रहा है। विपक्षी दलों के पास मोदी विरोध के अलावा कोई वैकल्पिक विचारधारा नहीं है। विपक्ष अभी भी पुरानी जातिगत और समुदाय विशेष के समीकरणों से गुंथी राजनीति में अपना भविष्य तलाश रही है। जबकि देश उनकी कथित सेकुलर राजनीति को बहुत अच्छे से समझ चुका है। इसलिए विपक्ष जिन नारों और ख्यालों के साथ भाजपा के विरुद्ध महागठबंधन बनाने का प्रयास कर रहा है, वह खोखले हैं। वर्तमान स्थिति देखकर लगता नहीं कि विपक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के सामने किसी प्रकार की चुनौती प्रस्तुत कर पाएगा। 

विदेश