जिस तरह मौसम करवट बदल रहा है, उसे देखकर सामान्य व्यक्ति को भी यह पूर्वानुमान था कि इस साल गर्मी की तपिश कुछ अधिक ही रहेगी। ठंड ने भी बेरुखी दिखाई और जल्द विदा हो गई। अचानक से सूरज ने जो तेवर पकड़े हैं उसे देखकर और मौसम विभाग की भविष्यवाणी के आधार पर सामान्य जनमानस ही नहीं, शासन और प्रशासन भी हलाकान है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी है कि गर्मियां इस बार पिछले साल के मुकाबले ज्यादा परेशान करेंगी। उसने बताया कि मार्च से लेकर मई के बीच उत्तर भारत में औसत तापमान पिछले वर्षों की अपेक्षा डेढ़ डिग्री तक अधिक रहेगा। हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में तो तापमान की यह बढ़ोतरी 2.7 डिग्री तक पहुंचने के आसार हैं। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक के सुदूर दक्षिणी इलाकों में इतना बुरा हाल नहीं होगा, पर वहां भी आधे से 1 डिग्री का अंतर तो रहेगा ही। साफ है कि देश के लगभग सभी क्षेत्र इस बार सूरज की तपिश से बेचैनी महसूस करेंगे। जब देश के विभिन्न हिस्सों में यूं भी हर साल दर्जनों लोग मौत का शिकार बन जाते हैं तब यह बढ़ा हुआ तापमान क्या गुल खिलाएगा, इसके बारे में फिलहाल सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। मौसम की प्रतिकूलता पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ती जा रही है। पृथ्वी के तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी वैश्विक चिंता का सबब रही है। विशेषज्ञ तापमान में इस संभावित बढ़ोतरी के पीछे भी ग्लोबल वार्मिंग की ही भूमिका देख रहे हैं। चिंताजनक यह है कि ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन वैश्विक नेतृत्व ने अभी तक इसे अपनी प्राथमिकताओं में स्थान नहीं दिया है। नतीजा यह होता है कि इस पर होने वाली अंतरराष्ट्रीय बैठकों में चिंताएं तो जताई जाती हैं, पर औद्योगिक विकास, जीडीपी में बढ़ोतरी और रोजगार के अवसर पैदा करने का दबाव इन चिंताओं पर भारी पड़ता है। हमें समझना होगा कि वक्त हमारे हाथ से तेजी से निकलता जा रहा है। इससे पहले कि देर हो जाए, हमारा चेतना जरूरी है। वैज्ञानिक भी इस बात को लेकर ज्यादा आश्वस्त नहीं हैं कि मानवीय गतिविधियों से बढऩे वाले तापमान का दुष्प्रभाव किस स्तर तक होगा। हमें समझना होगा कि पर्यावरण की अनदेखी से हम विकास नहीं कर सकते। प्रकृति को साथ लेकर ही मनुष्य आगे बढ़ सकता है। वैश्विक तापमान में यह बढ़ोतरी अप्रत्याशित या अस्वाभाविक नहीं है। बल्कि, मानवीय क्रिया-कलापों से वैश्विक तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक विषयों की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचरÓ विभिन्न जलवायुवीय क्षेत्रों के अध्ययन के आधार पर दावा करती है कि 50 से 70 फीसदी तक जलवायु परिवर्तन के लिए मानव जिम्मेवार है। जब जलवायु परिवर्तन के लिए हम ही जिम्मेदार हैं, तो फिर हमें ही इसका समाधान तलाशना होगा। इसके लिए व्यक्तिगत स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो प्रयास हो सकते हैं, करने चाहिए। परिवर्तन के प्रयास बड़े स्तर से प्रारंभ होंगे, तब तक हम इंतजार करेंगे, यह प्रवृत्ति ठीक नहीं। यह विचार भी अच्छा नहीं कि एक व्यक्ति के प्रयास से क्या संभव है। जितनी जल्दी हो सकता है, उतनी जल्दी सभी मानवों को, देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को इस बात को समझ लेना चाहिए कि पर्यावरण की चिंता किए बिना, इस प्रकार की चुनौतियों एवं समस्याओं का समाधान नहीं है। 

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