त्रिपुरा  में भारतीय जनता पार्टी की जीत के अनेक अभिप्राय हैं। यह जीत शून्य से शिखर की कहानी है। यह विजय अराष्ट्रीय/अभारतीय विचारधारा की शिकस्त की दास्तान है। यह जीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बलिदान के सम्मान की गाथा है। यह आगाज है पूरब में केसरिया सूरज का। पांच वर्ष पहले जिस भाजपा को त्रिपुरा में मात्र डेढ़ प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, उसी भाजपा ने अब त्रिपुरा की 50 प्रतिशत जनता के दिल में जगह बना ली है। भारतीय जनता पार्टी की यह जीत राजनीतिक विश्लेषकों, राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि केरल की तरह त्रिपुरा को भी कम्युनिस्टों का अजेय दुर्ग समझा जाता था। अजेय इसलिए, क्योंकि कम्युनिस्ट अपने प्रभाव क्षेत्र में किसी और को सांस तक नहीं लेने देते हैं। किसी और विचार के लिए 'पार्टी विलेजÓ में तिल भर भी स्थान नहीं है। इस बात की पुष्टि करती हैं केरल के आसमान में सुनाई देतीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भाजपा सहित गैर-वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं की चीखें। त्रिपुरा के लालगढ़ की दीवारें भी संघ के प्रचारकों एवं कार्यकर्ताओं के लहू से ही लाल हैं। त्रिपुरा की यह जीत भारत से हिंसक विचारधारा के सफाये की शुरुआत है। यही कारण है कि त्रिपुरा में जो भूकंप आया है, उसकी धमक से केरल का लाल किला भी हिल गया है। इस बात में कोई दो मत नहीं कि कम्युनिस्ट पार्टी का बोरिया-बिस्तर केवल भाजपा ही बाँध सकती है। कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल, कभी उनके कंधे पर सवार हो जाते हैं, तो कभी उनकी बाँह थाम लेते हैं। उसका उदाहरण है, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। ममता दीदी अपनी पूरी जिंदगी जिस विचारधारा से लड़ती रहीं, त्रिपुरा में उनकी दिली ख्वाहिश थी कि भले ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माक्र्सवादी)/माकपा जीत जाए, किंतु भाजपा नहीं जीतनी चाहिए। क्योंकि, त्रिपुरा में भाजपा की जीत से बंगाल की राजनीति में भी भारी हलचल होने वाला है। बहरहाल, जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी की सरकारें रहती हैं, वहाँ दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता जान हथेली पर रखकर काम करते हैं। इसलिए कम्युनिस्टों के गढ़ में 50 प्रतिशत जनता को अपने पक्ष में कर लेना साधारण बात नहीं है। इसलिए त्रिपुरा में 25 साल से जमी माणिक सरकार को उखाड़ फेंकना, राजनीति विद्वानों के लिए अध्ययन का विषय बनता है। भाजपा के हाथों धूल चाटने को मजबूर कम्युनिस्ट कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि उनका विचार अब जंग खा गया है। कम्युनिज्म प्रगतिशीलता की निशानी नहीं, अपितु जड़ता की पहचान बन गया है। यह विचारधारा खोखली है। आचार-विचार में अंतद्र्वंद्व है। कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की कथनी-करनी भारत और भारतीयता के विरुद्ध हो चुकी है। प्रत्येक प्रसंग में भारतीय संस्कृति का विरोध करना और उसका मखौल उड़ाना भी कम्युनिस्टों की पराजय का प्रमुख कारण है। कम्युनिज्म अलोकतांत्रिक विचार है। इसलिए त्रिपुरा की जीत भारतीयता के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत भी है। यदि वामपंथी लोकतंत्र में किंचित भी भरोसा करते तो अपनी इस पराजय को खुले दिल से स्वीकार करते और जनादेश को समझने की कोशिश करते। किंतु, उनको लोकतंत्र में भरोसा कहाँ है? भारत में परंपरा रही है कि यहाँ के राजनीतिक दल अपने विरुद्ध आए जनादेश को भी स्वीकार करते हैं। अपनी पराजय पर मंथन-चिंतन करते हैं। जबकि, त्रिपुरा की इस पराजय पर कम्युनिस्टों का व्यवहार ऐसा है मानो- 'रस्सी जल गई, किंतु एंठन नहीं गई।Ó माकपा नेताओं ने भाजपा की जीत को धनबल, बाहुबल एवं सांप्रदायिकता की जीत करार देकर उक्त लोकोक्ति को चरितार्थ किया है। उनके कुछ नेता एवं विचारक तो त्रिपुरा की जनता को उलाहना देते हुए यहाँ तक कह रहे हैं कि- 'त्रिपुरा को फासीवादी एवं सांप्रादायिक सरकार मुबारक हो।Ó यह हताशा का प्रकटीकरण है। यह जनता का अपमान है। जनता को दोष देने से अधिक अच्छा होगा कि माकपा आईना देखे। त्रिपुरा की जनता में एक बेचैनी थी। देश के शेष राज्य जहाँ विकास के मार्ग पर अग्रसर थे, मुख्यधारा में शामिल थे, वहीं त्रिपुरा पिछड़ा और छिटका हुआ था। ईमानदार मुख्यमंत्री की आड़ में जो भ्रष्टाचार व्याप्त था, जनता उससे परेशान हो चुकी थी। वह माकपा का विकल्प ढूंढ़ रही थी। विकल्प के रूप में उसे भाजपा मिली, तो उसने भाजपा का राजतिलक कर दिया है। अब उम्मीद है कि माकपा के २५ साल में जो राज्य मुख्यधारा से पिछड़ गया था, वह अब देश के बाकी राज्यों के साथ कदमताल करेगा। 

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