पंजाब  नेशनल बैंक और अन्य बैंकों के घोटाले सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने सुधार के प्रयास शुरू कर दिए हैं। यह आवश्यक भी है। यदि बीमार होती बैंकिंग व्यवस्था को अभी नहीं संभाला गया तो बहुत देर हो जाएगी। बीमार बैंकिंग प्रणाली हमारी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाएगी। बैंकिंग व्यवस्था में सुधार की दिशा में वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 50 करोड़ रुपये से अधिक के सारे एनपीए खातों की जांच करने और उनमें किसी तरह की गड़बड़ी मिलने पर इसकी सूचना सीबीआई को देने का निर्देश दिया है। साथ ही पीएमएलए, फेमा और अन्य प्रावधानों के उल्लंघन की जांच के लिए उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राजस्व आसूचना निदेशालय (डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस) के साथ मिलकर चलने को कहा है। यह समय की आवश्यकता है कि इस बात की पुख्ता निगरानी हो कि डिफॉल्टर संस्था/व्यक्ति लगातार ऋण पर ऋण न लेते रहें। वित्त मंत्रालय ने तमाम बैंकों को परिचालन और तकनीकी जोखिमों से निपटने के लिए 15 दिनों के भीतर एक पुख्ता व्यवस्था तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं। वित्तीय सेवा विभाग के सचिव राजीव कुमार ने कहा कि बैंकों के कार्यकारी निदेशकों और मुख्य तकनीकी अधिकारियों को जोखिम से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को व्यवस्थित करने के मकसद से एक कार्ययोजना तैयार करने के लिए कहा गया है। उधर रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को 30 अप्रैल तक स्विफ्ट प्रणाली को कोर बैंकिंग प्रणाली के साथ जोडऩे का निर्देश दिया है। इससे लेन-देन को लेकर बैंकों की अंदरूनी निगरानी प्रक्रिया मजबूत होगी। देखना है कि बैंकों के आला अधिकारी इस समस्या से निपटने के लिए अपनी तरफ से क्या कदम उठाते हैं। एक बात तो तय है कि सीबीआई या प्रवर्तन निदेशालय के बूते इस बीमारी का इलाज संभव नहीं। ये एजेंसियां बाकी मामलों में किस तरह से काम कर रही हैं, यह जगजाहिर है। समाधान ऐसा ढूंढना होगा कि जालसाजी की भनक शुरुआत में ही मिल सके और एनपीए का ढेर लगने से पहले उसे रोका जा सके। बड़े स्तर पर एनपीए की बीमारी 2009 के आसपास शुरू हुई, जब मंदी से मुकाबले के नाम पर बड़े उद्योगपतियों ने भारी-भरकम कर्ज लिए, लेकिन इसका कोई उत्पादक इस्तेमाल नहीं कर सके। उत्पादन बढ़ाने के वायदे और कर्जखोरी के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींची जानी चाहिए थी, जो नहीं खींची जा सकी।इस तरह कुछेक उद्योगपतियों के लिए बैंक दुधारू गाय बन गए। दरअसल बैंकों में भी एक दोहरी व्यवस्था चल रही है। उद्योगपतियों के लिए बैंक कुछ और हैं, साधारण लोगों के लिए कुछ और। मोदी सरकार से उम्मीद भी है और अपेक्षा भी कि वह बैंकिंग व्यवस्था को अधिक सुदृ? और पारदर्शी बनाये ताकि भविष्य में कोई माल्या, नीरव या चौकसी देश का धन लूटकर न भाग पाए।

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