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1857 की महानायिका-महारानी लक्ष्मीबाई
Fri 19 Nov ,2010 (01:52:42 ,PM)

महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन यात्रा शौर्य, वीरता, देशभक्ति, कठोर अनुशासन और आत्मविश्वास की अद्भुत मिसाल थी। वे सन् 1857 के स्वतंत्र समर की महानायिका थीं, उनके बिना 1857 की क्रांति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। रानी लक्ष्मीबाई ने नारी के उस रूप को शाश्वत किया जिसमें महिषासुरमर्दिनी और रणचण्डी माना जाता है। उनके हृदय में देशभक्ति रत्नद्वीप की भांति प्रकाशमय थी। एक ओर जहां वे युद्धकौशल में निपुण, घुड़सवारी में असाधारण, तलवारबाजी में अद्वितीय थीं तो दूसरी ओर नारी के स्वाभाविक स्वभाव, त्याग, प्रेम, उदारता, समर्पण उनमें कूट-कूटकर भरा था। वे अपने सम्मान के प्रति सदैव सजग रही, उन्होंने यही कामना की कि यदि वे रणभूमि में लड़ते-लड़ते मृत्यु को वरन करें तब भी उनका शव अंग्रेजों के हाथ न लगे। सर्वाधिक वंदनीय था उनका राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत हृदय जिसके पावनस्मरण मात्र से आज भी प्रत्येक राष्ट्रभक्त का मस्तष्क उनके चरणों में नत हो जाता है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अंग्रेजों से संघर्ष में झोंक दिया और इतिहास में अमरत्व प्राप्त कर लिया। इस वरीयतम, शौर्यवान पराक्रमी महानायिका का जन्म 19 नवम्बर, 1835 में काशी की पुण्यधरती पर हुआ था। उनके पिता मोरो पंत तांवे जो अप्पा साहब पेशवा के निकटस्थ साथियों में से थे, माता भागीरथी बाई ने अत्यंत प्रेमपूर्वक बालिका का नाम मनुबाई रखा, तब शायद किसी ने इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि यही बालिका आगे चलकर महारानी लक्ष्मीबाई बनेगी और अंगे्रजों के छक्के छुड़ा दगी। परिस्थितियां कुछ ऐसी बदली कि पंत परिवार को काशी का परित्याग कर ब्रहमहवर्त आना पड़ा यहीं बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र नानासाहब अपना बाल्यकाल व्यतीत कर रहे थे, यही नानासाहब  के संसर्ग में लक्ष्मीबाई के जीवन को एक नई दिशा प्राप्त हुई। नानासाहब जो लक्ष्मीबाई पर बहन की भांति स्नेह रखते थे उनके साथ मनु भी युद्ध कौशल, तलवारबाजी, घुड़सवारी आदि में पारंगत हो गई। सन 1842 में मनुबाई का परिणय झांसी के महाराज गंगाधर बाला के साथ संपन्न हुआ और वे झांसी की महारानी बन गई जहां वे अपनी उदारता, दया तथा तयागमय स्वभाव के कारण जल्द ही प्रजा में लाकप्रिय हो गई। परंतु दुर्भाग्य से अल्पावस्था में ही लक्ष्मीबाई विधवा हो गई तथा नि:संतान होने के कारण दत्तक पुत्र के रूप में उन्होंने दामोदर को ग्रहण किया। यहीं से उनका अंगे्रजों से संघर्ष का आरंीा हुआ। यह वो समय था जबकि अंगे्रज संपूर्ण देश में अपना साम्राज्य स्थापित करने का अथक प्रयास कर रहे थे। वे किसी न किसी बहाने से अपनी ताकत के बाल पर छोटे बड़े राज्यों को अपने आधीन करना चाहते थे अपने विरुद्ध किसी भी प्रकार के विरोध का अत्यंत क्रूरतापूर्वक दम कर रहे थे। जब अंगे्रजों ने देखा कि झांसी का कोई उत्तराधिकारी नहीं है तथा वहां एक महिला का शासन है तो वे झांसी जैसे महत्वपूर्ण राज्य को अपने आधीन करने का आतुर हो गए, परंतु अंगे्रज रानीक े स्वभाव से परिचित न ोि। जब रानी को अंगे्रजों की  इस चाल का आभास हुआ तो वे रणचंडी की भांति गरज उठी कि ‘ मैं अपनी झांसी किसी को नहीं सौंपूंगी’ तथा अंगे्रजों से लोहा लेने को तत्पर हो गई।
लक्ष्मीबाई की प्रेरणा पाकर ही संपूर्ण बुंदेलखंड में क्रांति की ज्वाला धधक उठी। रानी लक्ष्मी  बाई ने झांसी की संपूर्ण बागडोर अपने हाथों में ले ली और कुशलतापूर्वक राजकाज चलाने लगी। वे पुरुष वेश धारण कर दरबार में बैठती, वे अत्यंत बुद्धिमान थी उनकी स्मरण शक्त् िगजब की थी, रानी लक्ष्मीबाई के निर्णय स्पष्ट   संक्षिप्त व निश्चित रहते थे, न्याय के प्रति वे सदैव सजग रहती थी।  उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य बल्कि संपूर्ण बुंदेलखंड को एक सूत्र में पिरोने का असंभव सा कार्य किया, उनकी वाणी इतनी ओजस्वी, स्वभाव इतनाउदार नेतृत्व के गुण में परिपूर्ण था कि महिलाओं सहित उनकी संपूर्ण प्रजा ने अंगे्रजों का दमन करने में खुलकर हिस्सा लिया, उन्होंने अपनी रानी के लिए अपनी झांसी के लिए राष्ट्र  के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। एक अंगे्रज अफसर ने क्रांति के बारे में लिखा- ‘’ स्त्रियों तोपखाने में गोला-बारूद पहुंचाने का रसद पहुंचाने का काम करती थीं, और कभी तलवार लेकर युद्ध भूमि में भी कूद पड़ती थीं।
महारानी लक्ष्मीबाई ने कई बार सीमित साधनों से अंगे्रजों केा विशाल सेना का वीरतापूर्वक सामना किया। वे स्वयं संपूर्ण सेना का नेतृत्व करती थीं। युद्ध में वे अतुल धैर्य, साहस, शौर्य का परिचय देती हुई घूम-घूम कर सैनिकों के हृदय में उत्साह का संचार करती थीं, तभी तो वे एक साथ अंगे्रजों को जोरदार चुनौती देती हुई, अत्यंत  वीरतापूर्वक मृत्यु से जूझती हुई शत्रु की सुदृढ़ छावनी को चीरकर पेशवा की सेना से जा मिलीं।   यहां भी रानी लक्ष्मीबाई ने क्रांतिकारियों को संगठित कर अपने रणकौशल का परिचय दिया। युद्ध के दौरान उनकी दो प्रिय सखियां मंदार व काशी उनके साथ साए की भांति लगी रहती थीं। वे रानी लक्ष्मीबाई के कवच के रूप में कार्य करती थीं पुरुष वेश में विभूषित  इन दोनों बालाओं को रानी लक्ष्मीबाई के साथ भारतीय इतिहास में सदैव याद किया जाता रहेगा। महारानी लक्ष्मीबाई ने पेशवा की सेना की सहायता से अंगे्रजों के विरुद्ध जमकर लोहा लिया तथा गोरी सेना के लिए सिरदर्द बन गई अत्यंत  वीरतापूर्वक  अंगे्रजी सेना को अपनी तलवार से गाजर-मूली की भांति काटती हुई युद्ध भूमि में अपनी अंतिम  सांस तक डटी रही, एक समय ऐसा आया कि जब प्रतीत हुआ कि लक्ष्मीबाई शत्रु के अभदे कवच को भेदकर सुरक्षित  निकल जाएगी, परंतु उनका नया घोड़ा अपने स्वामिनी के ऊपर मंडराते संकट को नहंी भांप सका तथा वही अड़ गया, इसी बीच शिकारी कुत्तों को भांति अंगे्रज सैनिक उन पर झपट पड़े परंतु  वीरांगना ने हिम्मत हारना तो जैसे सीखा ही नहीं था पीछे हटना अथवा घुटने टेकना उनके स्वभाव के विपरीत था उन्होंने शत्रु का डटकर मुकाबला किया और 16 जून 1857 को अंतिम सांस तक अंगे्रजों का दमन करती हुई वीरगति को प्राप्त हुई, उनकी इच्छानुसारउनके शव भी अंगे्रज के हाथ न लगा। लक्ष्मीबाई के विश्वासपात्र रामचंद्रराव देशमुख ने शत्रु की आंख बचाकर वहीं उनका अग्नि संस्कार किया। इस प्रकार महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने जीवन का लक्ष्य पूर्ण किया, उन्होंने एक ऐसा जीवन जिया तो संपूर्ण राष्ट्र का  नाम उज्जवल करता है, एक महिला जिसने अपने जीवन के मात्र तेईस बसंत ही देखे अपने कार्यों से इतिहास में अमर हो गई जब तक भारत का अस्तित्व रहेगा, 1857 की क्रांति की याद रहेगी तब तक महारानी लक्ष्मीबाई की स्मृति भी जीवित रहेगी।            - स्वराज संदर्भ

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